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उत्तराखण्ड

हॉफ के एक आदेश से प्रदेश में जड़ी बूटी कारोबार पर लगा ग्रहण

हॉफ के एक आदेश से प्रदेश में जड़ी बूटी कारोबार पर लगा ग्रहण, एक लाख लोगों के प्रभावित होने की आशंका

(सलीम मलिक)

रामनगर। प्रदेश के परंपरागत जड़ी बूटी व्यवसाय पर वन विभाग के प्रमुख वन संरक्षक का एक आदेश भारी पड़ने लगा है। इस वन उपज की रॉयल्टी दरों में की गई बेतहाशा वृद्धि के चलते कारोबारियों की दिलचस्पी विदेशी माल में होने लगी है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि इससे पर्वतीय क्षेत्रों के एक लाख से अधिक लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड के चमोली, पौड़ी, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर जैसे पर्वतीय क्षेत्रों के जंगलों में बड़ी संख्या में लोग मौज घास, झूला पत्ता, तेजपत्ता एकत्रित करने का काम करते हैं। वन उपज की श्रेणी में शामिल इस सामग्री को ऋषिकेश, रामनगर, टनकपुर आदि मंडियों में पहुंचाने के लिए गढ़वाल मंडल विकास निगम, कुमाउं मण्डल विकास निगम, वन विकास निगम तथा भेषज संघ लगभग 4 रुपए किलो की दर से रॉयल्टी लेकर निकासी रवन्ना जारी करता है। जिससे बाद जड़ी बूटी संग्रहकर्ता इन्हें वन विकास निगम के डिपो पहुंचाते हैं। जहां नीलामी के बाद यह माल व्यापारियों के गोदाम में पहुंचता हैं। प्रदेश में तीन स्थानों पर मंडी होने के बाद भी इसका मुख्य कारोबार केवल रामनगर में ही होता है। व्यापारियों के यहां इन जड़ी बूटी की क्वालिटी के हिसाब से ग्रेडिंग कर पैकिंग के बाद यह माल यूपी, केरल, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश के अलावा अरब देशों को भेजा जाता है। जहां इनसे विभिन्न प्रकार के मसाले, इत्र, सौंदर्य प्रसाधन, आयुर्वेदिक दवाइयों का निर्माण किया जाता है।

उत्तराखंड के अलावा इन जड़ी बूटियों का उत्पादन नेपाल, मोरक्को, नाइजीरिया, वियतनाम आदि देशों में भी होता है। लेकिन भारत में इनके महंगे होने के कारण बाजार में उत्तराखंड की जड़ी बूटी की ही मांग अधिक रहती है। लेकिन इस वर्ष फरवरी माह में वन विभाग के तत्कालीन मुखिया अनूप मलिक ने वन निगम के माध्यम से होने वाली प्रकाष्ठ बिक्री की तर्ज पर इन जड़ी बूटियों पर रॉयल्टी को भी वन निगम की विक्रय दर का चालीस प्रतिशत कर दिया है। नए आदेश से पूर्व औसतन दो सौ रुपए किलो की दर तक बिकने वाली जड़ी बूटी की दर लगभग तीन सौ रुपए किलो तक पहुंचने लगी है। जबकि नेपाल व अन्य देशों से आने वाली यही जड़ी बूटी जीएसटी तथा आयात शुल्क के बाद करीब सवा दो सौ रुपए किलो की दर से खुले बाजार में उपलब्ध है। ऐसे में इस व्यवसाय से जुड़े लोगों ने स्वदेशी जड़ी बूटी के स्थान विदेशी माल को तरजीह देना शुरू कर दिया है। जिसका सीधा खामियाजा पर्वतीय क्षेत्र के जड़ी बूटी संग्रहकर्ताओं को उठाना पड़ रहा है। प्रदेश में इन जड़ी बूटी का सालाना कारोबार सवा सौ करोड़ रुपए है। जबकि वन निगम के आंकड़ों के अनुसार साल 2022-23 में जड़ी बूटी का कुल कारोबार 138 करोड़ रुपए था। एक आकलन के अनुसार प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में करीब एक लाख लोग जड़ी बूटी संग्रह के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। जबकि रामनगर में जड़ी बूटी की ग्रेडिंग व पैकिंग के काम में भी पांच सौ से अधिक लोग कार्यरत हैं। ऐसे में वन विभाग के मुखिया द्वारा जड़ी बूटी रॉयल्टी दरों में की गई भारी वृद्धि के कारण बाजार में स्थानीय उत्पाद नहीं टिक पा रहा है। जड़ी बूटी कारोबारियों का कहना है कि वन विभाग द्वारा बिना शासन के अनुमोदन के लागू किए गए इस आदेश के बाद उनके सामने स्थानीय उत्पाद के महंगा होने के कारण उसे खरीदना मुश्किल हो रहा है। इससे कम दाम में विदेशी जड़ी बूटियां बाजार में बिक रही हैं। यदि वन विभाग ने अपने इस आदेश में तब्दीली नहीं की तो पहाड़ की महंगी जड़ी बूटी बाजार में नहीं टिक पाएगी। जिसका सीधा नुकसान पर्वतीय क्षेत्रों में लगे जड़ी बूटी संग्रहकर्ताओं को होगा। जो पहले से ही पलायन की मार झेल रहे प्रदेश के हित में नहीं होगा।

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