उत्तराखण्ड
तबादला आदेश हुआ ‘बेअसर’! रामनगर PWD की कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं संजय चौहान?
21 जुलाई को शासन ने देहरादून भेजा, 20 अगस्त तक रामनगर में ही चार्ज! ‘तत्काल ज्वाइनिंग’ के आदेश पर उठे गंभीर सवाल
रामनगर।
सरकारी तबादला आदेशों की भी अपनी एक किस्मत होती है—कुछ आदेश जारी होते ही अमल में आ जाते हैं और कुछ शायद फाइलों के बीच ऐसी जगह पहुंच जाते हैं, जहां से बाहर निकलने में पूरा महीना लग जाता है।
रामनगर के लोक निर्माण विभाग में अधिशासी अभियंता संजय चौहान के तबादले का मामला इन दिनों कुछ ऐसा ही सवाल खड़ा कर रहा है।
21 जुलाई 2026 को उत्तराखंड शासन के लोक निर्माण विभाग की ओर से जारी कार्यालय ज्ञाप के मुताबिक संजय चौहान का स्थानांतरण निर्माण खंड, लोनिवि रामनगर से कार्यालय-प्रमुख अभियंता, लोनिवि, देहरादून किया गया था।
आदेश में सिर्फ तबादला ही नहीं किया गया, बल्कि संबंधित अभियंताओं को नई तैनाती स्थल पर तत्काल कार्यभार ग्रहण करने और कार्यभार प्रमाणक शासन को उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए गए।
लेकिन सवाल यह है कि 20 अगस्त तक रामनगर PWD की कुर्सी पर वही चेहरा क्यों दिखाई दे रहा है?
‘तत्काल’ का मतलब एक महीना तो नहीं होता साहब!
शासन का आदेश साफ है—नई तैनाती स्थल पर तत्काल कार्यभार ग्रहण किया जाए।
अब यदि 21 जुलाई के आदेश के बाद भी 20 अगस्त तक रामनगर में पुराने अधिकारी का ही चार्ज बना हुआ है, तो सवाल सिर्फ अधिकारी से नहीं, बल्कि पूरे विभागीय सिस्टम से है।
क्या शासन के आदेश की कोई एक्सपायरी डेट होती है?
या फिर तबादला आदेश तब तक सिर्फ कागज माना जाता है, जब तक साहब खुद उसे मानने के मूड में न हों?
यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि आदेश की प्रति में स्पष्ट रूप से संजय चौहान की वर्तमान तैनाती निर्माण खंड, लोनिवि, रामनगर और नवीन तैनाती कार्यालय-प्रमुख अभियंता, लोनिवि, देहरादून दर्ज है।
रामनगर की कुर्सी इतनी ‘आरामदायक’ क्यों?
रामनगर PWD की कुर्सी आखिर इतनी खास है कि शासन के तबादला आदेश के करीब एक महीने बाद भी इसे छोड़ने की स्थिति साफ नहीं है?
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि अधिकारी अपने तबादले को रुकवाने के प्रयास में हैं। यह भी कहा जा रहा है कि इसके लिए राजनीतिक सिफारिश लगाए जाने की कोशिश हुई है।
हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
लेकिन अगर तबादला रोकने की कोई प्रक्रिया शासन स्तर पर चल रही है तो उसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए।
तबादला हुआ है या नहीं?
आदेश प्रभावी है या स्थगित?
स्थगन आदेश जारी हुआ है तो वह कहां है?
और अगर तबादला प्रभावी है तो चार्ज हस्तांतरण क्यों नहीं हुआ?
जनता को इन सवालों का जवाब मिलना चाहिए।
सड़कें गड्ढों में, लेकिन कुर्सी पर पकड़ मजबूत!
रामनगर PWD के कामकाज को लेकर जनता की नाराजगी का एक बड़ा कारण क्षेत्र की सड़कों की हालत भी है।
कई मार्गों पर गड्ढे लोगों के लिए परेशानी का कारण बने हुए हैं। कहीं मरम्मत हुई तो कुछ समय बाद सड़क फिर गड्ढों में तब्दील होने की शिकायतें सामने आती हैं।
यानी सड़क का गणित कुछ यूं दिखाई देता है—
गड्ढा भरो → सड़क चमके → बारिश आए → गड्ढा फिर दिखाई दे!
ऐसे में सवाल यह है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी सड़कें टिकाऊ क्यों नहीं बन पा रहीं?
करीब 30 करोड़ के काम… और आगे भी करोड़ों के टेंडर
सूत्रों के अनुसार संजय चौहान के कार्यकाल में रामनगर PWD खंड में करीब 30 करोड़ रुपये के विकास कार्य हुए हैं और आगे भी करोड़ों रुपये के कार्यों के टेंडर प्रस्तावित बताए जा रहे हैं।
यहां किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार या व्यक्तिगत आर्थिक लाभ का आरोप लगाना उचित नहीं होगा, जब तक उसके ठोस प्रमाण सामने न हों।
लेकिन करोड़ों के सरकारी काम अपने आप में यह सवाल जरूर पैदा करते हैं कि—
कामों की गुणवत्ता की निगरानी कैसे हुई?
कितने कामों की गुणवत्ता जांची गई?
कितने काम निर्धारित मानकों पर खरे उतरे?
और जिन सड़कों पर जनता चल रही है, उनकी वास्तविक स्थिति क्या है?
अगर शासन चाहे तो इन सवालों के जवाब रिकॉर्ड और थर्ड पार्टी गुणवत्ता जांच के जरिए आसानी से सामने आ सकते हैं।
‘मक्खन’ वाली सड़क या ‘मलाई’ वाली फाइल?
रामनगर की जनता को उम्मीद रहती है कि करोड़ों के बजट से ऐसी सड़कें बनेंगी जिन पर सफर मक्खन जैसा हो।
लेकिन अगर सड़क कुछ ही समय बाद फिर गड्ढों में बदल जाए तो जनता के मन में स्वाभाविक सवाल पैदा होता है—
मक्खन सड़क पर लगा या फाइल पर?
और रही ‘मलाई’ की बात तो वह किसे मिली, मिली भी या नहीं—यह किसी व्यंग्य का निष्कर्ष नहीं बल्कि जांच का विषय होना चाहिए।
क्योंकि सरकारी धन जनता का है और उसका हिसाब भी जनता को मिलना चाहिए।
तबादला आदेश के बाद भी चार्ज बरकरार—जिम्मेदार कौन?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल संजय चौहान से भी आगे जाता है।
यदि अधिकारी ने वास्तव में नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण नहीं किया है, तो विभाग ने अब तक क्या कदम उठाया?
क्या कार्यभार हस्तांतरण के लिए कोई लिखित निर्देश जारी हुए?
क्या नए अधिकारी की तैनाती की प्रक्रिया शुरू हुई?
क्या तबादला आदेश पर कोई संशोधन या स्थगन जारी हुआ?
या फिर सिस्टम ने चुपचाप मान लिया कि “साहब अभी यहीं ठीक हैं।”
अगर शासन का आदेश लागू है और फिर भी उसका पालन नहीं हो रहा, तो यह सिर्फ एक अधिकारी का मामला नहीं बल्कि प्रशासनिक अनुशासन का सवाल है।
शासन से सवाल: आदेश सिर्फ कागज पर क्यों?
उत्तराखंड शासन को इस मामले में स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
21 जुलाई का आदेश प्रभावी है या नहीं?
यदि प्रभावी है तो 20 अगस्त तक चार्ज हस्तांतरण क्यों नहीं हुआ?
यदि तबादला रोक दिया गया है तो उसका आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
और यदि अधिकारी ने आदेश का पालन नहीं किया तो विभागीय स्तर पर क्या कार्रवाई की गई?
क्योंकि जनता के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है—
अगर शासन का अपना तबादला आदेश ही जमीन पर लागू नहीं हो पाएगा, तो फिर आम कर्मचारी से आदेशों के पालन की उम्मीद कैसे की जाएगी?
रामनगर की जनता को फिलहाल नई सड़क से ज्यादा पुराने गड्ढों और नई तैनाती से ज्यादा पुरानी कुर्सी की कहानी दिखाई दे रही है।
अब देखना यह है कि शासन इस ‘कुर्सी-कांड’ को महज प्रशासनिक देरी मानता है या फिर तबादला आदेश, चार्ज हस्तांतरण और करोड़ों के निर्माण कार्यों—तीनों की फाइल खोलकर असली तस्वीर सामने लाता है।
क्योंकि जनता को PWD में ‘सेटिंग’ की कहानी नहीं, सड़क पर ‘फिटिंग’ चाहिए—ऐसी सड़क की, जिसमें गड्ढे नहीं हों।




