उत्तराखण्ड
उत्तराखंड में 2026 में रिश्वतखोरी पर विजिलेंस का शिकंजा, करीब 32 आरोपी जेल भेजे गए
देहरादून/नैनीताल।
उत्तराखंड में सरकारी दफ्तरों में रिश्वतखोरी के खिलाफ विजिलेंस की कार्रवाई लगातार सुर्खियों में है। साल 2026 अभी खत्म भी नहीं हुआ है और मुख्यमंत्री के हवाले से सामने आए आंकड़ों के मुताबिक करीब 32 रिश्वतखोर आरोपियों को जेल भेजा जा चुका है।
इन कार्रवाईयों में सरकारी विभागों के अधिकारी-कर्मचारी, पुलिसकर्मी, तहसील कर्मचारी, बिजली विभाग के इंजीनियर, शिक्षा विभाग के अधिकारी और अन्य कर्मचारी शामिल हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या विजिलेंस की गिरफ्त में आ रहे ये लोग ही पूरी कहानी हैं?
या फिर यह उस बड़े सिस्टम की सिर्फ वे मछलियां हैं, जो जाल में दिखाई दे गईं?
30 हजार की रिश्वत लेते पटवारी गिरफ्तार
ताजा मामला नैनीताल जिले की धारी तहसील का है। यहां विजिलेंस ने पटवारी निर्मल को कथित तौर पर 30 हजार रुपये की रिश्वत लेते गिरफ्तार किया है।
आरोप है कि जमीन की नाप-जोख के एवज में रिश्वत की मांग की गई थी।
एक तरफ सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात करती है, दूसरी तरफ जमीन की नाप जैसे सामान्य राजस्व काम के लिए रिश्वत मांगने के आरोप में पटवारी विजिलेंस के हाथों गिरफ्तार होता है।
यानी सवाल सिर्फ 30 हजार रुपये का नहीं है।
सवाल उस मानसिकता का है, जिसमें सरकारी सेवा को नागरिक का अधिकार नहीं बल्कि कमाई का जरिया समझ लिया जाता है।
कभी ₹3,500, कभी ₹80 हजार और कहीं ₹1 लाख
2026 में सामने आए विजिलेंस ट्रैप मामलों पर नजर डालें तो रिश्वत की रकम कुछ हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक पहुंचती दिखाई देती है।
बाजपुर में नायब नाजिर को कथित तौर पर ₹3,500 लेते पकड़ा गया।
सितारगंज में राजस्व विभाग के दो कर्मचारियों के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई हुई।
UPCL के एक JE पर ₹80 हजार की रिश्वत मांगने का आरोप लगा।
डोईवाला में शिक्षा विभाग से जुड़े मामले में ₹1 लाख के ट्रैप में गिरफ्तारी हुई।
बेतालघाट में पुलिस कांस्टेबल पर ₹45 हजार की रिश्वत का आरोप लगा।
UREDA बागेश्वर के परियोजना अधिकारी को ₹40 हजार लेते पकड़े जाने की कार्रवाई सामने आई।
इन मामलों में आरोप अलग-अलग हैं और हर आरोपी को अदालत में अपना पक्ष रखने का अधिकार है। लेकिन घटनाओं की यह श्रृंखला सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार निगरानी की जरूरत जरूर दिखाती है।
विजिलेंस की कार्रवाई बढ़ी, लेकिन सवाल भी बड़ा हुआ
सितंबर में मुख्यमंत्री के हवाले से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में करीब 32 रिश्वतखोर आरोपियों को जेल भेजे जाने की बात सामने आई।
यह आंकड़ा अपने आप में बताता है कि विजिलेंस की कार्रवाई इस वर्ष लगातार सक्रिय रही है।
लेकिन यहीं से दूसरा सवाल पैदा होता है—
अगर इतने लोग पकड़े जा रहे हैं, तो क्या यह सिर्फ विजिलेंस की सफलता की कहानी है या सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार की गहराई का संकेत भी है?
क्योंकि रिश्वत लेते पकड़ा जाना और भ्रष्टाचार खत्म होना—दो अलग बातें हैं।
“सिर्फ मछली पकड़ी है… मगरमच्छ नहीं”
भ्रष्टाचार के मामलों में अक्सर सबसे ज्यादा चर्चा उस कर्मचारी की होती है जो रिश्वत लेते हुए कैमरे या विजिलेंस के जाल में पकड़ लिया जाता है।
लेकिन व्यवस्था का बड़ा सवाल यह है कि—
क्या भ्रष्टाचार सिर्फ उस टेबल तक सीमित है, जहां पैसा पकड़ा गया?
या फिर उसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क, संरक्षण या व्यवस्था भी काम करती है?
हर मामले में ऐसा नेटवर्क हो, यह कहना भी उचित नहीं होगा। लेकिन जहां बार-बार अलग-अलग विभागों से रिश्वत के मामले सामने आते हैं, वहां सिस्टम की जवाबदेही और निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
विजिलेंस का काम रिश्वत लेते व्यक्ति को पकड़ना है।
लेकिन सरकार और विभागों की जिम्मेदारी इससे आगे शुरू होती है—
ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हो कि आम आदमी को अपने वैध काम के लिए रिश्वत देनी पड़े?
असली लड़ाई गिरफ्तारी से आगे की है
किसी आरोपी की गिरफ्तारी निश्चित रूप से कार्रवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ असली परीक्षा तब होगी जब—
शिकायत के बाद कार्रवाई तेज हो,
सरकारी सेवाओं की प्रक्रिया पारदर्शी हो,
रिश्वत मांगने वालों पर प्रभावी विभागीय कार्रवाई हो,
दोष सिद्ध होने पर कानून के मुताबिक कठोर कार्रवाई हो,
और आम नागरिक को अपने काम के लिए किसी बिचौलिए या रिश्वत की जरूरत न पड़े।
क्योंकि एक पटवारी की गिरफ्तारी से एक मामला खत्म हो सकता है, लेकिन भ्रष्टाचार की समस्या नहीं।
और आखिर में सवाल वही…
सिर्फ मछली पकड़ी जा रही है… या कभी जाल उस तालाब के मगरमच्छों तक भी पहुंचेगा?
उत्तराखंड की जनता को सिर्फ गिरफ्तारियों की संख्या नहीं चाहिए।
उसे ऐसी व्यवस्था चाहिए जहां काम कराने के लिए रिश्वत देना मजबूरी नहीं, बल्कि रिश्वत मांगना ही सरकारी कर्मचारी के लिए सबसे बड़ा जोखिम हो।
फिलहाल विजिलेंस की कार्रवाई जारी है…
और सवाल भी।
— एटम बम




