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हॉर्मुज़ में अकेले पड़ गए ट्रंप! युद्धपोत भेजने से कतराए सहयोगी देश, कूटनीति के मैदान में अमेरिका को झटका

हॉर्मुज़ में अकेले पड़ गए ट्रंप! युद्धपोत भेजने से कतराए सहयोगी देश, कूटनीति के मैदान में अमेरिका को झटका

दुनिया की सबसे ताकतवर मानी जाने वाली अमेरिकी कूटनीति को उस समय बड़ा झटका लगा, जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अपील पर उसके करीबी सहयोगी देश भी आगे आने से कतराते नजर आए। मामला है दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों में से एक हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य का—जहां अमेरिका चाहता था कि उसके सहयोगी देश अपने युद्धपोत भेजकर एक तरह का सैन्य गठबंधन तैयार करें।
लेकिन हैरानी की बात यह रही कि जिन देशों को अमेरिका अपना सबसे मजबूत साथी बताता है, वही देश इस बार कदम पीछे खींचते दिखे। ब्रिटेन, ग्रीस, फ्रांस, जर्मनी और जापान जैसे देशों ने साफ शब्दों में युद्धपोत भेजने से मना कर दिया।
यह सिर्फ एक साधारण इनकार नहीं था, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसे ट्रंप की कूटनीतिक हार के रूप में देखा जा रहा है।

हॉर्मुज़ क्यों बना दुनिया की राजनीति का केंद्र

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है।
यह वही संकरा समुद्री मार्ग है जहां से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल का व्यापार होता है।
पर्शियन गल्फ से निकलने वाला तेल इसी रास्ते से होकर एशिया, यूरोप और अमेरिका तक पहुंचता है। ऐसे में अगर यहां तनातनी बढ़ती है तो इसका असर सीधे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
पिछले कुछ समय से ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ते तनाव के कारण हॉर्मुज़ में सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। अमेरिका चाहता था कि उसके सहयोगी देश मिलकर यहां एक सैन्य उपस्थिति बनाएं, ताकि जहाजों की सुरक्षा के नाम पर दबाव बनाया जा सके।
लेकिन दुनिया की राजनीति इतनी सीधी नहीं होती।
ट्रंप की अपील, लेकिन सहयोगियों ने खींच लिए हाथ
सूत्रों के मुताबिक ट्रंप ने करीब सात देशों से अपील की थी कि वे हॉर्मुज़ में अपने युद्धपोत भेजें।
इसका मकसद था कि अमेरिका अकेले इस जोखिम को न उठाए और एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के जरिए ईरान पर दबाव बनाया जाए।
लेकिन परिणाम उल्टा निकला।
ब्रिटेन ने युद्धपोत भेजने से मना कर दिया
ग्रीस ने भी कदम पीछे खींच लिए
फ्रांस ने भी कोई सैन्य सहयोग देने से इनकार कर दिया
जर्मनी ने साफ कहा कि वह इस मिशन में शामिल नहीं होगा
जापान भी दूरी बनाकर खड़ा हो गया
इनकार की यह सूची इतनी लंबी हो गई कि अमेरिका की रणनीति ही सवालों के घेरे में आ गई।

कूटनीति में बढ़ती अमेरिका की अकेलापन

यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका को अपने सहयोगियों से ऐसा ठंडा जवाब मिला हो।
पिछले कुछ वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अमेरिका की एकतरफा नीतियों ने उसके सहयोगियों को असहज किया है।
ट्रंप के कार्यकाल में ही अमेरिका ने कई बड़े फैसले लिए थे—
पेरिस क्लाइमेट समझौते से बाहर निकलना
ईरान परमाणु समझौते को खत्म करना
कई देशों पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाना
इन फैसलों ने यूरोप और एशिया के कई देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या हर मुद्दे पर अमेरिका का साथ देना सही होगा।
हॉर्मुज़ के मामले में भी वही तस्वीर दिखाई दी।

चीन की चुप्पी भी एक संदेश

दिलचस्प बात यह रही कि इस पूरे घटनाक्रम पर चीन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और वह पर्शियन गल्फ से बड़े पैमाने पर तेल आयात करता है।
ऐसे में हॉर्मुज़ में तनाव का असर सीधे चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
लेकिन इसके बावजूद चीन ने इस मुद्दे पर खुलकर कोई बयान नहीं दिया।
कूटनीतिक हलकों में इसे रणनीतिक चुप्पी कहा जा रहा है—जहां चीन बिना सीधे टकराव में पड़े हालात पर नजर बनाए हुए है।

भारत के जहाजों को मिली सीमित अनुमति

इस पूरे घटनाक्रम के बीच भारत का नाम भी चर्चा में आया।
ईरान ने भारत के दो जहाजों को हॉर्मुज़ क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति दी है, लेकिन यह अनुमति भी सीमित और शर्तों के साथ है।
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर खुद इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि ईरान ने सभी जहाजों को एक साथ अनुमति नहीं दी है।
उनका कहना है कि हर जहाज को अलग-अलग आधार पर अनुमति दी जाएगी।
इसका मतलब साफ है कि ईरान इस पूरे मामले में बेहद सतर्क रणनीति अपनाए हुए है।

ईरान की रणनीति क्या है

ईरान लंबे समय से अमेरिका के साथ टकराव की स्थिति में है।
अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाला है।
लेकिन इसके बावजूद ईरान ने हॉर्मुज़ को अपने रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान इस रास्ते पर पूरी तरह से नियंत्रण तो नहीं चाहता, लेकिन वह यह जरूर दिखाना चाहता है कि हॉर्मुज़ में उसकी भूमिका बेहद अहम है।
यही वजह है कि वह जहाजों को अनुमति देने के मामले में चयनात्मक नीति अपना रहा है।

दुनिया क्यों डर रही है हॉर्मुज़ से

हॉर्मुज़ में सैन्य गतिविधि बढ़ने का मतलब सिर्फ एक क्षेत्रीय तनाव नहीं है।
अगर यहां किसी तरह की सैन्य झड़प होती है तो उसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।
तेल की कीमतें अचानक आसमान छू सकती हैं
वैश्विक व्यापार प्रभावित हो सकता है
एशिया और यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ सकता है
यही वजह है कि कई देश इस मुद्दे पर सैन्य हस्तक्षेप से बचना चाहते हैं।

ट्रंप की रणनीति पर उठे सवाल

कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की विदेश नीति अक्सर दबाव और धमकी की रणनीति पर आधारित रही है।
लेकिन हर बार यह रणनीति कामयाब हो, यह जरूरी नहीं है।
हॉर्मुज़ के मामले में सहयोगी देशों का पीछे हटना यह दिखाता है कि दुनिया अब हर मुद्दे पर अमेरिका के साथ खड़े होने को तैयार नहीं है।
यह स्थिति अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल खड़े करती है।
क्या बदल रही है दुनिया की शक्ति संतुलन
आज की दुनिया पहले जैसी नहीं रही।
अब कई देशों के पास अपनी स्वतंत्र विदेश नीति है और वे हर मामले में किसी एक ताकत के पीछे चलने को तैयार नहीं हैं।
यूरोप के देश भी अब कई मामलों में स्वतंत्र रणनीति अपनाने लगे हैं।
एशिया में चीन तेजी से एक बड़ी शक्ति बन चुका है।
ऐसे में अमेरिका की पुरानी शैली की कूटनीति को पहले जैसा समर्थन मिलना मुश्किल हो गया है।

भारत के लिए क्या मायने

भारत के लिए हॉर्मुज़ बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल इसी क्षेत्र से आयात करता है।
अगर यहां तनाव बढ़ता है तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ सकता है।
यही वजह है कि भारत इस पूरे मुद्दे पर बेहद संतुलित नीति अपनाता दिखाई देता है।
एक तरफ वह अमेरिका के साथ अपने संबंध बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ ईरान के साथ भी संवाद बनाए रखना भारत के लिए जरूरी है।
अंत में
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य का यह घटनाक्रम सिर्फ एक समुद्री रास्ते की कहानी नहीं है।
यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति की उस बदलती तस्वीर का संकेत है, जहां अब दुनिया के देश आंख बंद करके किसी एक ताकत के पीछे नहीं चलते।
ट्रंप की अपील को ठुकराना यह दिखाता है कि अमेरिका की कूटनीति को अब पहले जैसा समर्थन नहीं मिल रहा।
और शायद यही वजह है कि हॉर्मुज़ जैसे संवेदनशील इलाके में अमेरिका आज खुद को कुछ हद तक अकेला महसूस कर रहा है।
दुनिया की राजनीति में यह एक छोटा घटनाक्रम जरूर है, लेकिन इसके संकेत बहुत बड़े हैं—
क्योंकि यह बताता है कि वैश्विक शक्ति संतुलन अब तेजी से बदल रहा है।

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