उत्तराखण्ड
काशीपुर की सियासत में ‘बयानों का बूमरैंग’ — मेयर दीपक बाली खुद ही कटघरे में खड़े!
काशीपुर की राजनीति इन दिनों बयानबाज़ी से ज़्यादा बयानों के अंजाम पर चर्चा में है। काशीपुर के मेयर दीपक बाली को पूर्व कैबिनेट मंत्री और गदरपुर से भाजपा विधायक अरविन्द पांडे पर टिप्पणी करना ऐसा उल्टा पड़ा कि निशाना सामने वाले से ज़्यादा खुद मेयर पर लग गया।
दीपक बाली ने आरोप जड़ दिया कि अरविन्द पांडे ने 2022 के विधानसभा चुनाव में खटीमा से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को साजिशन हरवाया और सुखवंत आत्महत्या मामले पर राजनीति कर रहे हैं।
लेकिन राजनीति में कहावत है—जब उंगली उठती है, तो तीन उंगलियां खुद की तरफ भी होती हैं।
CBI की मांग और ‘सिस्टम’ की बेचैनी
सुखवंत आत्महत्या मामले में अरविन्द पांडे द्वारा CBI जांच और ऊधमसिंह नगर के SSP के खिलाफ जांच की मांग को मेयर ने राजनीति बताया। सवाल ये है कि अगर जांच की मांग राजनीति है, तो फिर न्याय क्या है?
या फिर समस्या जांच से नहीं, जांच के नतीजों से है?
सोशल एक्टिविस्ट का पलटवार: “साजिशकर्ता कौन?”
काशीपुर के सोशल एक्टिविस्ट गगन कम्बोज ने दीपक बाली को ऐसा आड़े हाथ लिया कि पूरा बयान ही पलट गया।
गगन कम्बोज का कहना है कि 2022 में मुख्यमंत्री को हराने की साजिश अरविन्द पांडे ने नहीं, खुद दीपक बाली ने की, जब वे आम आदमी पार्टी में थे और काशीपुर से चुनाव लड़ रहे थे।
गगन ने तंज कसते हुए कहा—
“जब अरविन्द पांडे CBI जांच की मांग कर रहे हैं, तो इसमें गलत क्या है? क्या सच से डर लगता है?”
अवसरवाद की सीढ़ियाँ और सत्ता की छलांग
गगन कम्बोज ने दीपक बाली के राजनीतिक सफर को “पार्टी बदलो—पद पाओ” मॉडल बताया।
कभी हरीश रावत के दौर में कांग्रेस के साथ,
फिर भाजपा सरकार में अरविन्द पांडे के साथ,
और जैसे ही मुख्यमंत्री बदले—AAP छोड़ भाजपा में एंट्री और मेयर की कुर्सी।
यहां सवाल सीधा है—सिद्धांत बदले या सुविधा?
मेयर की जीत पर भी सवाल
गगन कम्बोज ने मेयर चुनाव जीत पर भी सवाल खड़े करते हुए कहा कि दीपक बाली को जनता ने नहीं, हालात ने जिताया।
और सबसे गंभीर आरोप—
अगर सुखवंत आत्महत्या केस की CBI जांच हुई, तो दीपक बाली की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, क्योंकि सुखवंत मदद मांगने कई बार उनके पास भी गया था।
डर, धमकी और लोकतंत्र
प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत में गगन कम्बोज ने आशंका जताई कि इस बयान के बाद उनकी हत्या भी हो सकती है।
यह बयान सिर्फ डर नहीं, सिस्टम पर सवाल है—क्या सच बोलना अब जान जोखिम में डालना हो गया है?
कटाक्ष में सवाल
क्या बयानबाज़ी से सच दब जाएगा?
क्या CBI जांच से राजनीति बेनकाब होगी?
और क्या काशीपुर की सियासत में अब सवाल पूछना भी गुनाह है?
फिलहाल इतना तय है—यह मामला बयान से शुरू हुआ था, लेकिन खत्म जांच पर ही होगा।




