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चीनी के दामों में उबाल: उत्तराखंड में त्योहारी सीजन से पहले बिगड़ा रसोई का बजट

चीनी के दामों में उबाल: उत्तराखंड में त्योहारी सीजन से पहले बिगड़ा रसोई का बजट

उत्तराखंड में चीनी की कीमतों ने बढ़ाई मिठास की लागत, देशभर में दाम रिकॉर्ड स्तर के करीब; केंद्र के आयात फैसले से राहत की उम्मीद

देहरादून/हल्द्वानी।
त्योहारों का मौसम दस्तक देने वाला है और इसी बीच रसोई में इस्तेमाल होने वाली चीनी ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। देशभर में चीनी की कीमतों में तेजी का असर अब उत्तराखंड के बाजारों में भी महसूस किया जा रहा है। आने वाले दिनों में गणेश चतुर्थी, नवरात्र, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहारों के चलते मिठाई, बेकरी और अन्य खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ने की संभावना है। ऐसे में चीनी के लगातार महंगे होने से आम उपभोक्ता के साथ-साथ मिठाई कारोबारियों की लागत भी बढ़ रही है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 20 अगस्त 2026 के आसपास देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत करीब ₹59 प्रति किलो तक पहुंच गई है। कई बाजारों में कीमत इससे काफी अधिक बताई जा रही है। पिछले कुछ समय में कीमतों में आई तेजी ने चीनी को एक बार फिर घरेलू बजट के लिए चिंता का विषय बना दिया है।

उत्तराखंड में क्यों बढ़ सकती है परेशानी?

उत्तराखंड चीनी उत्पादन के मामले में देश के सबसे बड़े राज्यों में शामिल नहीं है। राज्य की घरेलू मांग का एक बड़ा हिस्सा बाहरी राज्यों से आने वाली सप्लाई पर निर्भर करता है। ऐसे में राष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने का सीधा असर यहां के थोक और खुदरा बाजार पर पड़ता है।

खासकर देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर, हल्द्वानी और नैनीताल जैसे बड़े बाजारों में त्योहारों से पहले चीनी की मांग बढ़ने की संभावना है। मिठाई की दुकानों, होटल-रेस्टोरेंट, बेकरी और खाद्य कारोबार से जुड़ी इकाइयों के लिए चीनी प्रमुख कच्चे माल में शामिल है।

आखिर चीनी महंगी क्यों हुई?

चीनी की कीमतों में मौजूदा उछाल के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं।

पहला कारण—घरेलू उपलब्धता पर दबाव।
कुछ प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में उत्पादन और गन्ने की उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियों ने बाजार में सप्लाई को प्रभावित किया है।

दूसरा—एथेनॉल के लिए गन्ने का इस्तेमाल।
गन्ने और उससे बनने वाले उत्पादों का एक हिस्सा एथेनॉल उत्पादन की ओर जाने से चीनी के लिए उपलब्ध मात्रा पर असर पड़ा है।

तीसरा—त्योहारों की बढ़ती मांग।
आने वाले महीनों में मिठाई और खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ने वाली है। कारोबारी पहले से स्टॉक करने लगते हैं, जिससे बाजार पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

चौथा—जमाखोरी की आशंका।
तेजी के माहौल में बड़े खरीदारों और कारोबारियों द्वारा अतिरिक्त स्टॉक रखने की आशंका भी कीमतों को प्रभावित कर सकती है। इसी वजह से केंद्र सरकार ने स्टॉक सीमा और बाजार निगरानी को सख्त किया है।

केंद्र ने खोला आयात का रास्ता

बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी को ड्यूटी-फ्री आयात करने की अनुमति दी है। सरकार की कोशिश है कि अतिरिक्त विदेशी सप्लाई घरेलू बाजार में पहुंचे और उपलब्धता बढ़ने से कीमतों पर दबाव कम हो।

अब बड़ा सवाल यह है कि आयातित चीनी बाजार में कितनी तेजी से पहुंचती है और इसका फायदा उत्तराखंड जैसे उपभोक्ता राज्यों तक कितनी जल्दी पहुंचता है।

मिठाई महंगी होगी या दुकानदार मार्जिन घटाएंगे?

चीनी के दाम बढ़ने का सबसे सीधा असर मिठाई कारोबार पर पड़ सकता है। मिठाई की कीमत सिर्फ चीनी पर निर्भर नहीं करती, बल्कि दूध, मावा, घी, ड्राई फ्रूट्स, गैस और मजदूरी की लागत भी इसमें शामिल होती है।

ऐसे में यदि चीनी की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो त्योहारों के दौरान मिठाई और अन्य चीनी आधारित खाद्य उत्पादों की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।

आम आदमी की जेब पर कितनी मार?

एक-दो किलो चीनी खरीदने वाले परिवार पर कीमत में कुछ रुपये की बढ़ोतरी मामूली लग सकती है। लेकिन होटल, चाय की दुकान, मिठाई की दुकान, बेकरी और खाद्य प्रसंस्करण जैसे कारोबारों में रोजाना बड़ी मात्रा में चीनी इस्तेमाल होती है। वहां लागत में बढ़ोतरी काफी ज्यादा होती है और आखिरकार उसका कुछ हिस्सा उपभोक्ता से वसूला जा सकता है।

यानी चीनी की कीमत सिर्फ चाय के कप तक सीमित नहीं है—यह मिठाई से लेकर बिस्कुट, बेकरी और कई दूसरे खाद्य उत्पादों की कीमत को भी प्रभावित कर सकती है।

अब नजर सरकार और बाजार पर

उत्तराखंड में त्योहारी सीजन शुरू होने से पहले सबसे बड़ी चुनौती सप्लाई को सामान्य बनाए रखना और अनावश्यक जमाखोरी पर रोक लगाने की होगी।

केंद्र के ड्यूटी-फ्री आयात के फैसले से बाजार में राहत की उम्मीद जरूर जगी है, लेकिन इसका वास्तविक असर तभी दिखाई देगा जब अतिरिक्त चीनी समय पर बाजार में पहुंचे और खुदरा स्तर तक कीमतों में कमी का फायदा उपभोक्ताओं को मिले।

फिलहाल सवाल सिर्फ इतना नहीं कि चीनी कितनी महंगी हो गई है। सवाल यह भी है कि त्योहारों की मिठास कहीं महंगाई की चाशनी में और कड़वी तो नहीं होने वाली?

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