उत्तराखण्ड
शिक्षा निदेशालय में घुसे विधायक समर्थक, प्रारंभिक शिक्षा निदेशक से कथित मारपीट… दहशत में कर्मचारी, प्रदेशभर में आंदोलन की चेतावनी
देहरादून में सत्ता का ‘दबदबा’ या कानून का मज़ाक?
शिक्षा निदेशालय में घुसे विधायक समर्थक, प्रारंभिक शिक्षा निदेशक से कथित मारपीट… दहशत में कर्मचारी, प्रदेशभर में आंदोलन की चेतावनी
देहरादून: राजधानी के शिक्षा निदेशालय में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब प्रारंभिक शिक्षा निदेशक अजय कुमार नौडियाल के साथ कथित मारपीट की सनसनीखेज घटना सामने आई। आरोप सीधे तौर पर भाजपा विधायक उमेश शर्मा काऊ और उनके समर्थकों पर लगाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि विधायक समर्थकों के साथ निदेशालय पहुंचे, जहां स्कूल का नाम बदलने को लेकर शुरू हुई बहस अचानक इतनी बढ़ी कि मामला हाथापाई तक जा पहुंचा।
घटना के दौरान निदेशालय परिसर में अफरा-तफरी मच गई। कर्मचारियों में दहशत का माहौल बन गया और दफ्तर का कामकाज ठप पड़ गया। आरोप है कि विवाद के दौरान आक्रामक रवैया अपनाया गया और निदेशक अजय कुमार नौडियाल के साथ धक्का-मुक्की व मारपीट हुई। घटना के बाद उन्हें उपचार के लिए देहरादून के कोरोनेशन अस्पताल ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार दिया गया।
“सवाल पूछना अपराध है क्या?” — कर्मचारियों का फूटा गुस्सा
घटना की खबर फैलते ही शिक्षा विभाग के कर्मचारियों में आक्रोश भड़क उठा। कर्मचारी संगठनों ने निदेशालय के बाहर धरना शुरू कर दिया और साफ कहा कि अगर किसी निर्णय या कार्यप्रणाली पर आपत्ति थी, तो उसका रास्ता कानून और प्रक्रिया से होकर जाता है, न कि दबंगई और धमकाने से। कर्मचारियों ने संबंधित विधायक और उनके समर्थकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग करते हुए चेतावनी दी है कि कार्रवाई नहीं हुई तो प्रदेशव्यापी आंदोलन छेड़ा जाएगा।
सत्ता बनाम सिस्टम — किसके हाथ में कानून?
पूरी घटना ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या अब सरकारी दफ्तर भी जनप्रतिनिधियों के ‘प्रेशर रूम’ बनते जा रहे हैं? क्या अधिकारियों से असहमति का मतलब सीधे मारपीट और दबाव की राजनीति है? राजधानी के सबसे संवेदनशील शैक्षणिक निदेशालय में घुसकर कथित तौर पर हुई इस घटना ने प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा तंत्र दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
राजनीतिक रंग लेने लगा मामला
निदेशक अजय कुमार नौडियाल ने विधायक पर गंभीर आरोप लगाए हैं, वहीं कर्मचारियों का दावा है कि विधायक समर्थकों ने अभद्र व्यवहार करते हुए आक्रामक रुख अपनाया। उधर, अभी तक पुलिस और जिला प्रशासन की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन जिस तरह से मामला गरमाता जा रहा है, उससे साफ है कि यह विवाद अब महज एक विभागीय टकराव नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने की ओर बढ़ रहा है।
चुप्पी तोड़नी होगी, वरना संदेश जाएगा गलत
अगर राजधानी के मुख्य निदेशालय में बैठे एक वरिष्ठ अधिकारी खुद को असुरक्षित महसूस करें और उनके साथ कथित मारपीट हो जाए, तो फिर बाकी सिस्टम किस भरोसे चलेगा? यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि उस डर का आईना है जिसमें अफसरशाही और कर्मचारी काम करने को मजबूर हो रहे हैं।
अब सबकी नजर पुलिस और सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी है। क्योंकि अगर इस मामले में सख्त और निष्पक्ष कदम नहीं उठाया गया, तो संदेश साफ जाएगा—सत्ता के सामने कानून और व्यवस्था बौनी है।




