उत्तराखण्ड
गड्ढा मुक्त का ढोल, हकीकत में गड्ढों का राज छोई–मोतीपुर सड़क पर विकास नहीं, सरकारी लापरवाही की खुली प्रदर्शनी
गड्ढा मुक्त का ढोल, हकीकत में गड्ढों का राज
छोई–मोतीपुर सड़क पर विकास नहीं, सरकारी लापरवाही की खुली प्रदर्शनी
रामनगर विधानसभा क्षेत्र में छोई से लेकर मोतीपुर गाँव तक की सड़क आज सरकार के विकास दावों पर करारा तमाचा बन चुकी है। जगह-जगह गड्ढे, उखड़ी सतह और टूटी उम्मीदें—ये हालात पिछले मानसून से पहले के हैं, लेकिन हैरानी ये कि लोक निर्माण विभाग के अफसरों को यह सब दिखाई ही नहीं देता।
सरकार ने बड़े जोर-शोर से “गड्ढा मुक्त सड़क अभियान” का ढोल पीटा था। सवाल ये है कि क्या इस अभियान की सूची से छोई–मोतीपुर सड़क गलती से नहीं, जानबूझकर बाहर कर दी गई? क्योंकि अगर यह सड़क सूची में होती, तो शायद आज वाहन गड्ढों में हिचकोले नहीं, बल्कि सड़कों पर फर्राटे भर रहे होते।
यह वही इलाका है जो रिसॉर्ट और होटल इंडस्ट्री का नया हब बनता जा रहा है। देश के अलग-अलग राज्यों से सैलानी यहाँ पहुंचते हैं, लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करते हैं और सरकार की झोली हर महीने करोड़ों के राजस्व से भरती है। लेकिन बदले में सरकार क्या देती है?
टूटी सड़कें, टूटते शॉक एब्जॉर्बर और टूटा भरोसा।
पर्यटक आते हैं, तस्वीरें लेते हैं—जंगल, रिसॉर्ट, और सड़क के गड्ढे। सवाल उठता है कि क्या यही “डबल इंजन” का विकास मॉडल है, जहाँ इंजन तो चल रहा है, पर सड़क गायब है?
क्या विकास केवल फाइलों और भाषणों तक सीमित है, और ज़मीनी हकीकत गड्ढों में दबी हुई है?
रामनगर विधानसभा में यह सड़क सरकार की प्राथमिकता क्यों नहीं?
अब सवाल सीधा है—
क्या सरकार और लोक निर्माण विभाग गड्ढों को ही विकास मान चुके हैं?
अगर नहीं, तो फिर कब सुधरेगी छोई–मोतीपुर सड़क—अगले मानसून के बाद, या अगले चुनाव के भाषण से पहले?
जब सड़क गड्ढों से भरी हो, तो समझ लीजिए—विकास रास्ता भटक चुका है।




