उत्तराखण्ड
शिक्षा निदेशक से मारपीट के मामले में हिस्ट्रीशीटर समेत 4 आरोपी गिरफ्तार
देहरादून के रायपुर स्थित प्रारम्भिक शिक्षा निदेशालय का दफ्तर उस वक्त ‘लोकतंत्र’ नहीं, बल्कि ‘लाठी-ताकत’ का अखाड़ा बन गया, जब एक विवाद के दौरान सरकारी कार्यालय में घुसकर अराजकता, मारपीट और तोड़फोड़ का आरोप सामने आया। हैरानी की बात ये कि मामला किसी आम गुंडागर्दी का नहीं, बल्कि विधायक की मौजूदगी में हुए बवाल से जुड़ा है।
सरकारी दफ्तर में हंगामा, कुर्सियां उछलीं… लोग घायल
21 फरवरी 2026 को ननूरखेड़ा स्थित प्रारम्भिक शिक्षा निदेशक कार्यालय में एक प्रकरण को लेकर रायपुर विधायक उमेश शर्मा काउ अपने समर्थकों के साथ पहुंचे थे। बातचीत के दौरान विवाद इतना बढ़ा कि कुछ लोग बेकाबू हो गए। आरोप है कि दफ्तर के भीतर कुर्सियां और सामान फेंके गए, तोड़फोड़ हुई और मौजूद कर्मचारियों को चोटें आईं।
यानी जहां बच्चों की शिक्षा की योजनाएं बनती हैं, वहीं कानून और मर्यादा की धज्जियां उड़ती रहीं।
दो मुकदमे, कई धाराएं… फिर भी ‘राजनीतिक दबदबा’ का सवाल
निदेशक प्रारम्भिक शिक्षा अजय कुमार नौडियाल की तहरीर पर रायपुर थाने में सरकारी कार्य में बाधा, बलवा, संपत्ति को नुकसान, धमकी और गाली-गलौज जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ।
दूसरी ओर विधायक की सुरक्षा में तैनात कांस्टेबल की तहरीर पर भी मारपीट, हमला और अपमान से जुड़ी धाराओं में अलग मुकदमा दर्ज किया गया।
यहां बड़ा सवाल यही है—क्या सरकारी दफ्तर अब संवाद का मंच रह गए हैं या राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का नया अड्डा बनते जा रहे हैं?
वीडियो फुटेज से खुला ‘दफ्तर कांड’ का चेहरा
पुलिस ने प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, सबूत और वीडियो फुटेज खंगालकर कार्रवाई की। इसके बाद एक हिस्ट्रीशीटर समेत चार आरोपियों की पहचान कर गिरफ्तारी कर ली गई। गिरफ्तार आरोपियों में शामिल हैं:
अरविन्द पुण्डीर उर्फ कल्ली (हिस्ट्रीशीटर)
लक्ष्मण नवानी
राकेश थपलियाल
अक्षय राणा
इन सभी को न्यायालय में पेश किया जा रहा है।
असली सवाल: दफ्तर में कानून चलेगा या ‘राजनीतिक रौब’?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर सरकारी निदेशक का दफ्तर भी सुरक्षित नहीं, तो आम कर्मचारी और शिक्षक कहां जाएं?
क्या सरकारी कार्यालय अब जनप्रतिनिधियों के ‘पावर शो’ का मंच बनते जा रहे हैं?
और क्या ऐसे मामलों में केवल छोटे मोहरे ही गिरफ्तारी की जद में आएंगे, या असली जिम्मेदारी तय करने की हिम्मत भी सिस्टम दिखाएगा?
देहरादून का ये ‘दफ्तर कांड’ सिर्फ मारपीट और तोड़फोड़ का मामला नहीं, बल्कि उस मानसिकता की कहानी है जिसमें लोकतांत्रिक संवाद की जगह दबाव, धमकी और भीड़तंत्र ने ले ली है।




