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उत्तराखण्ड

मलीन बस्तियों में नशे का गढ़: बारिश में भी नहीं थमा सिस्टम का तलाशी अभियान

❖ मलीन बस्तियों में नशे का गढ़: बारिश में भी नहीं थमा सिस्टम का तलाशी अभियान
— ‘एटम बम’ विशेष रिपोर्ट

देहरादून की झुग्गी-झोपड़ियों और मलीन बस्तियों में नशे का कारोबार अब किसी छुपे हुए राज़ की तरह नहीं, बल्कि खुले ज़ख्म की तरह सामने आने लगा है। लंबे समय से ब्रह्मपुरी और मद्रासी कॉलोनी जैसे इलाकों से नशा तस्करी की शिकायतें मिल रही थीं, लेकिन हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि अब कागज़ी बैठकों और औपचारिक दौरों से बात नहीं बन रही।

14 जुलाई 2025 की दोपहर, जब देहरादून में मूसलधार बारिश हो रही थी, तब आम आदमी अपने घर की छत बचाने में लगा था—और इधर सिस्टम इन बस्तियों की नशे की छत ढहाने निकल पड़ा।

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, मद्रासी कॉलोनी और ब्रह्मपुरी जैसे इलाकों में नशा बेचने वालों की पैठ न सिर्फ गली-गली में हो चुकी है, बल्कि कई मामलों में यह कारोबार बड़े लोगों की छत्रछाया में भी पनपता है। और यही कारण है कि नशे की इस सप्लाई चेन को तोड़ना, महज छोटे-मोटे ड्रग पैडलर्स की गिरफ्तारी से संभव नहीं होगा।

इस दिन जब अधिकारी भारी बारिश में ग्राउंड जीरो पर पहुंचे तो उन्हें वही मिला जो आमतौर पर छुपा दिया जाता है—गंदगी में पनपता मुनाफा, बेरोजगारी में पलता नशा, और डर में जीती मासूम ज़िंदगियां।

❖ मलीन बस्तियों को बना दिया गया है टारगेट ज़ोन

देहरादून के मलीन इलाके नशा कारोबारियों के लिए सुरक्षित ज़ोन जैसे बन चुके हैं। यहां ना सिर्फ़ युवक और किशोर नशे के दलदल में फंस रहे हैं, बल्कि कई मामलों में महिलाएं भी ड्रग्स सप्लाई चेन में शामिल पाई गई हैं।

इन इलाकों में चरस, स्मैक, और अब एमडीएमए जैसे खतरनाक सिंथेटिक ड्रग्स की डिलीवरी किसी चाय की थड़ी जितनी आसान हो चुकी है।

❖ अवैध संपत्ति पर कार्रवाई की बात, लेकिन…

एक और बड़ी बात जो अधिकारियों द्वारा दोहराई गई वो थी—नशा तस्करों की अवैध संपत्ति को चिन्हित कर जब्त करने की प्रक्रिया। लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तव में ऐसा होता है?

क्योंकि आमतौर पर जिन नशा कारोबारियों को पकड़ा जाता है, वे नाम के छोटे खिलाड़ी होते हैं—असल खेल तो वो लोग खेलते हैं जो पर्दे के पीछे रहते हैं, राजनीति, सत्ता और पैसे की ताकत के सहारे।

❖ सवाल जो अभी बाकी हैं:

  • इन बस्तियों को नशा मुक्त करने की बात तो हर साल होती है, लेकिन आखिर कब तक सिर्फ़ बयानबाज़ी चलती रहेगी?
  • क्या सिर्फ चेकिंग अभियान ही समाधान है या इस सामाजिक बीमारी का कोई जमीनी इलाज भी सोचा जा रहा है?
  • जिन इलाकों में नशे की लत सबसे तेज़ी से फैल रही है, क्या वहां रोजगार, शिक्षा और पुनर्वास के ठोस प्रयास हो रहे हैं?

“नशा एक बीमारी नहीं, एक साज़िश है… और इस साज़िश को सिर्फ धरपकड़ नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिरोध से ही हराया जा सकता है।”
‘एटम बम’ संपादकीय टिप्पणी

👉 नशे के खिलाफ हमारी जंग जारी रहेगी… सच का धमाका होगा हर उस जगह, जहां ज़हर की खेप पहुंच रही

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