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उत्तराखण्ड

वीरपुर लच्छी में ‘आशा स्मृति पुस्तकालय’ का उद्घाटन, शिक्षा से बदलेगी बक्सा जनजाति गांव की तस्वीर

रामनगर, 26 जनवरी 2026।

कभी दर्द की चीखों से गूंजा यह गांव आज किताबों की खुशबू से महक उठा। बक्सा जनजाति बहुल गांव वीरपुर लच्छी में महिला एकता मंच द्वारा “आशा स्मृति पुस्तकालय” का शुभारंभ किया गया — एक ऐसी पहल जो सिर्फ पुस्तकालय नहीं, बल्कि एक बेटी की याद में जलाई गई ज्ञान की मशाल है।
10 वर्ष पूर्व इसी गांव के बीच से गुजर रहे खनन डम्पर की चपेट में आकर कक्षा 11 की होनहार छात्रा 17 वर्षीय आशा की दर्दनाक मृत्यु हो गई थी। उस दर्दनाक घटना ने पूरे गांव को झकझोर दिया था। आज उसी आशा की स्मृति में गांव में शिक्षा का एक स्थायी केंद्र स्थापित किया गया है।
पुस्तकालय का उद्घाटन मेनका देवी द्वारा किया गया।

यह पुस्तकालय क्यों खास है?

यह सिर्फ किताबों का कमरा नहीं —
यह उस सोच का जवाब है जो कहती है “गांवों में अवसर नहीं होते”।
पुस्तकालय में उपलब्ध हैं:
📚 कानून से जुड़ी पुस्तकें
🌿 पर्यावरण विषय
🔬 विज्ञान
👤 महापुरुषों की जीवनी
🧒 बाल कथाएं
📖 उपन्यास
🗳️ राजनीतिक और सामाजिक विषयों की पुस्तकें
पुस्तकालय की संचालक रजनी सिंह ने बताया कि यह पुस्तकालय शनिवार और रविवार को खुलेगा। कोई भी व्यक्ति सदस्यता लेकर निःशुल्क पुस्तकें पढ़ सकता है।

“धन छीना जा सकता है, ज्ञान नहीं” — सीमा सैनी

कार्यक्रम में दिल्ली से आईं महिला एकता मंच की सीमा सैनी ने भावुक शब्दों में कहा:
“सोना, चांदी, पैसा, संपत्ति कोई भी छीन सकता है… लेकिन किताबों से मिला ज्ञान जीवन भर साथ रहता है। यह रास्ता दिखाता है, और इसे कोई चुरा नहीं सकता।”
उन्होंने ग्रामवासियों को मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी “बूढ़ी काकी” भी पढ़कर सुनाई, जिससे माहौल साहित्यिक और भावुक हो उठा।

“कभी शिक्षा से वंचित थे, अब ज्ञान का हक हमारा” — गिरीश चन्द्र

गिरीश चन्द्र ने कहा कि एक समय था जब धर्मग्रंथों में शूद्रों और महिलाओं को शिक्षा का अधिकार नहीं था, जिसके कारण कई पीढ़ियां अशिक्षित रहीं।
आज जरूरत है कि हम शिक्षा की ताकत को समझें।
“पढ़ने-लिखने की कोई उम्र नहीं होती। यह पुस्तकालय बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के लिए ज्ञान का दरवाजा है।”

समाज की भागीदारी बनी ताकत

कार्यक्रम में रानी, कौशल्या, एडवोकेट कमलेश, लक्ष्मी, जगमोहन रावत, मुनीष कुमार सहित अनेक लोगों ने अपने विचार रखे।

यह सिर्फ पुस्तकालय नहीं… एक संदेश है

जहां एक बेटी की जिंदगी सड़क हादसे में बुझ गई, वहीं अब उसकी याद में सैकड़ों सपनों की रोशनी जलेगी।
“आशा” अब एक नाम नहीं, गांव की नई पहचान है।

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