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उत्तराखण्ड

देहरादून में ‘महिला आक्रोश मशाल यात्रा’—सियासी शक्ति प्रदर्शन या विपक्ष पर सीधा हमला?

देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून आज एक बड़े राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का गवाह बनी, जब पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में गांधी पार्क से घण्टाघर तक “महिला आक्रोश मशाल यात्रा” निकाली गई। हजारों की संख्या में महिलाओं की मौजूदगी ने इस आयोजन को महज एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि भाजपा की ओर से विपक्ष के खिलाफ बड़े राजनीतिक संदेश में बदल दिया।
इस मशाल यात्रा को महिला आरक्षण से जुड़े मुद्दे पर आक्रोश के रूप में पेश किया गया, लेकिन इसके मंच से जो बयानबाजी हुई, उसने साफ कर दिया कि निशाने पर सीधा विपक्ष था। मुख्यमंत्री धामी ने बिना नाम लिए विपक्षी दलों पर “महिला विरोधी मानसिकता” का आरोप लगाया और कहा कि कुछ राजनीतिक ताकतें वर्षों तक महिला आरक्षण को टालती रहीं और अब भी इसमें बाधा डालने की कोशिश कर रही हैं।

नारी शक्ति के नाम पर सियासी संदेश

गांधी पार्क से घण्टाघर तक निकली इस रैली में “अब नारी चुप नहीं रहेगी” जैसे नारों के बीच भाजपा ने महिला सशक्तिकरण को अपना मजबूत राजनीतिक एजेंडा बनाने की कोशिश की। बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी ने यह जरूर दिखाया कि पार्टी इस मुद्दे को चुनावी जमीन पर भुनाने की तैयारी में है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि आज की नारी “निर्णायक शक्ति” बन चुकी है और आने वाले समय में लोकतांत्रिक तरीके से उन ताकतों को जवाब देगी, जो महिलाओं के अधिकारों में बाधा बनती हैं। यह बयान सीधे तौर पर राजनीतिक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

विपक्ष पर अप्रत्यक्ष लेकिन तीखा वार

मंच से दिए गए भाषणों में भाजपा ने विपक्ष पर परिवारवाद और महिलाओं के मुद्दों को केवल “राजनीतिक हथियार” की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। यह भी कहा गया कि महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से कुछ दल असहज हैं, इसलिए वे उन्हें वास्तविक अधिकार देने से बचते रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह मशाल यात्रा महिला मुद्दों के साथ-साथ विपक्ष को घेरने की रणनीति का हिस्सा थी, जिसमें भावनात्मक और सामाजिक मुद्दों को जोड़कर बड़ा जनसमर्थन जुटाने की कोशिश की गई।

चुनावी जमीन तैयार करने की कोशिश?

इस पूरे आयोजन को सिर्फ सामाजिक आक्रोश नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक अभियान के रूप में देखा जा रहा है। जिस तरह से बड़ी भीड़, आक्रामक नारे और विपक्ष पर सीधे आरोप लगाए गए, उससे साफ है कि भाजपा महिला वोट बैंक को साधने के लिए आक्रामक मोड में आ चुकी है।
कार्यक्रम में महेंद्र भट्ट, रेखा आर्य, सविता कपूर और आशा नौटियाल समेत कई जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।

देहरादून की यह मशाल यात्रा एक साफ संकेत छोड़ गई—महिला सशक्तिकरण के मुद्दे को लेकर सियासत अब और तेज होने वाली है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सच में महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई है, या फिर चुनावी रणनीति के तहत विपक्ष को घेरने का नया हथियार?

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