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उत्तराखण्ड

“निजी स्कूलों पर शिकंजा… सरकारी स्कूल अब भी बेहाल”

नैनीताल में निजी स्कूलों पर ‘एक्शन’ की गूंज… लेकिन असली सवाल—सरकारी स्कूलों की बदहाली पर कौन बोलेगा?
फीस की लूट पर नोटिस, मगर शिक्षा व्यवस्था की जड़ें अब भी खोखली

नैनीताल जिले में निजी स्कूलों पर प्रशासन ने आखिरकार सख्ती दिखानी शुरू कर दी है। मुख्य शिक्षा अधिकारी के नोटिस के बाद कई स्कूलों की मान्यता पर खतरा मंडरा रहा है। आरोप वही पुराने—मनमानी फीस, महंगी किताबों का दबाव और नियमों की खुलेआम धज्जियां।
लेकिन इस पूरे “एक्शन मोड” के बीच एक सवाल फिर खड़ा हो गया है—
जब सरकारी स्कूल खुद बदहाली की मिसाल बने हों, तो निजी स्कूलों का “क्रेज” आखिर क्यों न बढ़े?
फीस के नाम पर खुला खेल—अब याद आई नियमों की किताब?
जांच में सामने आया कि निजी स्कूल:
NCERT के बजाय महंगी प्राइवेट किताबें थोप रहे थे
अभिभावकों को तय दुकानों से खरीदारी के लिए मजबूर कर रहे थे
ट्यूशन फीस के अलावा दर्जनों “छुपे टैक्स” वसूल रहे थे
अब प्रशासन कह रहा है कि ये सब गलत है।
लेकिन सवाल ये है—
ये सब सालों से चल रहा था, तब सिस्टम छुट्टी पर था क्या?
DM का आदेश: पैसा लौटाओ, वरना मान्यता जाएगी
जिला प्रशासन ने साफ कहा है:
अतिरिक्त वसूली गई फीस को एडजस्ट किया जाए
अनावश्यक किताबों पर रिफंड दिया जाए
15 दिन में नई बुक लिस्ट और फीस स्ट्रक्चर जारी हो
साथ ही चेतावनी भी—नियम नहीं माने तो मान्यता रद्द, जुर्माना और मामला CBSE तक।
कागज़ों में सब कुछ सख्त दिख रहा है…
लेकिन जमीन पर क्या होगा, ये जनता अच्छे से जानती है।
निजी स्कूलों की ‘कमाई मशीन’: एडमिशन से रोबोटिक फीस तक
जिन चार्जेस को प्रशासन ने अनुचित बताया है, वो खुद शिक्षा व्यवस्था का मजाक हैं—
एडमिशन फीस
रजिस्ट्रेशन फीस
वार्षिक शुल्क
टर्म फीस
सॉफ्टवेयर, कंप्यूटर, रोबोटिक फीस
यानी पढ़ाई कम, “पैकेज सिस्टम” ज्यादा।
स्कूल नहीं, पूरा “बिजनेस मॉडल” तैयार हो चुका है।
लेकिन असली कहानी यहां से शुरू होती है…
अगर निजी स्कूलों की मनमानी गलत है, तो ये भी उतना ही बड़ा सच है कि—
सरकारी स्कूलों की हालत ने ही निजी स्कूलों को ताकत दी है
टूटी बिल्डिंग, शिक्षकों की कमी, कमजोर पढ़ाई, जवाबदेही शून्य…
ऐसे में अभिभावक क्या करें?
मजबूरी में महंगे निजी स्कूलों की ओर भागते हैं, जहां कम से कम “पढ़ाई होने का भरोसा” तो मिलता है।
सरकार पर तंज: टैक्स पूरा, लेकिन शिक्षा अधूरी
सबसे बड़ा विरोधाभास यहीं है—
जनता से टैक्स पूरा वसूला जाता है
शिक्षा के नाम पर योजनाएं भी खूब गिनाई जाती हैं
लेकिन सरकारी स्कूलों का स्तर सुधारने पर ज़मीन पर काम? लगभग शून्य
यानी एक तरफ सरकारी स्कूलों की हालत ऐसी कि लोग भेजना नहीं चाहते…
दूसरी तरफ निजी स्कूलों पर कार्रवाई की तलवार लटकाकर “सिस्टम सुधारने” का दावा।
सवाल साफ है—
जब सरकारी स्कूल बेहतर नहीं बनेंगे, तो निजी स्कूलों का क्रेज कैसे रुकेगा?
अगर मान्यता गई… तो क्या तैयार हैं सरकारी स्कूल?
प्रशासन कह रहा है कि कार्रवाई होगी, मान्यता रद्द भी हो सकती है।
लेकिन अगर ऐसा हुआ तो—
हजारों बच्चे कहां जाएंगे?
क्या सरकारी स्कूल इतने सक्षम हैं कि अचानक आई भीड़ संभाल सकें?
या फिर बच्चों को एक व्यवस्था से निकालकर दूसरी कमजोर व्यवस्था में धकेल दिया जाएगा?
जांच कमेटी बनी… लेकिन भरोसा अभी भी अधूरा
विकासखंड स्तर पर जांच समितियां गठित की गई हैं, जो 15 दिन में रिपोर्ट देंगी।
लेकिन जनता का अनुभव कहता है—
रिपोर्ट आएगी, फाइल बनेगी, और मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाएगा

बीमारी गहरी है, इलाज सिर्फ नोटिस से नहीं होगा

नैनीताल में निजी स्कूलों की मनमानी पर कार्रवाई जरूरी है—इसमें कोई दो राय नहीं।
लेकिन सिर्फ नोटिस भेजकर और मान्यता रद्द करने की धमकी देकर शिक्षा व्यवस्था नहीं सुधरने वाली।
असली सुधार तब होगा जब सरकारी स्कूल मजबूत होंगे
जब अभिभावकों को “मजबूरी” नहीं, “विकल्प” मिलेगा
वरना यही होता रहेगा—
सरकारी स्कूल खाली…
निजी स्कूल महंगे…
और बीच में पिसता रहेगा आम आदमी।
फिलहाल—निजी स्कूलों पर तलवार जरूर लटकी है…
लेकिन शिक्षा व्यवस्था की जड़ें अब भी उसी तरह कमजोर हैं।

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नाम: खुशाल सिंह रावत
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