उत्तराखण्ड
पेट्रोल पम्प का स्कैनर बना ठगी का एटीएम, 4.5 लाख की ऑनलाइन लूट – सिस्टम सोता रहा, गिरोह मज़े करता रहा
देहरादून।
ऑनलाइन ठगी के बढ़ते मामलों के बीच एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां पेट्रोल पम्प के स्कैनर को ही ठगी का औज़ार बना दिया गया और करीब साढ़े चार लाख रुपये की रकम बेरोकटोक इधर-उधर होती रही। सवाल यह नहीं कि ठग पकड़ा गया, सवाल यह है कि यह खेल इतनी आसानी से और इतने समय तक कैसे चलता रहा?
रानीपोखरी क्षेत्र स्थित शहीद सुबाव पेट्रोल पम्प के खाते से जुड़े स्कैनर का इस्तेमाल कर अलग-अलग लोगों से ऑनलाइन ठगी की गई। हैरानी की बात यह है कि पेट्रोल पम्प जैसे संवेदनशील व्यावसायिक संस्थान का डिजिटल सिस्टम अपराधियों के लिए खुला मैदान बना रहा, और किसी को भनक तक नहीं लगी।
शिकायत के बाद हरकत में आया सिस्टम
31 जनवरी 2026 को पेट्रोल पम्प संचालक के परिजन प्रशांत रावत ने तहरीर देकर बताया कि स्कैनर के जरिए अज्ञात लोगों ने अवैध लेन-देन कर 4,50,000 रुपये की ठगी कर डाली, जिसके बाद रकम फ्रिज करानी पड़ी। तब कहीं जाकर मामला दर्ज हुआ।
राजस्थान से जुड़ती हैं ठगी की जड़ें
जांच के दौरान एक नाम सामने आया— युवराज सिंह भाटी (23 वर्ष), निवासी नागौर (राजस्थान)। पूछताछ में उसने कबूल किया कि वह वर्षों से कमीशन आधारित ऑनलाइन ठगी में लिप्त था और इस काम की “ट्रेनिंग” उसे पहले ही मिल चुकी थी।
युवराज ने अपने साथी प्रमोद उर्फ पम्मी के जरिए रानीपोखरी पेट्रोल पम्प का स्कैनर हासिल किया और उसी के माध्यम से ठगी की रकम इकट्ठा की जाती रही। पम्प के कर्मचारियों की भूमिका भी शक के घेरे में है, जिनकी मदद से स्कैनर में आई रकम निकाली जाती थी।
पुराना खिलाड़ी, नया शिकार
युवराज सिंह भाटी का आपराधिक इतिहास बताता है कि वह पहली बार कानून के रडार पर नहीं आया है। इससे पहले भी वह राजस्थान में ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले में जेल जा चुका है। इसके बावजूद वह खुलेआम ठगी का नेटवर्क खड़ा करता रहा।
एक गिरफ्तारी, कई सवाल
फिलहाल एक आरोपी गिरफ्त में है, जबकि निशांत उर्फ दिलखुश, श्रवण विश्नोई और प्रमोद उर्फ पम्मी अब भी फरार बताए जा रहे हैं। सवाल यह है कि
पेट्रोल पम्प का स्कैनर बाहर कैसे पहुंचा?
कर्मचारियों की भूमिका कब और कैसे तय होगी?
क्या केवल एक गिरफ्तारी से पूरा नेटवर्क उजागर हो गया मान लिया जाए?
बरामदगी ने खोली पोल
गिरफ्तार आरोपी से अलग-अलग बैंकों के चार डेबिट कार्ड और 35,200 रुपये नकद बरामद हुए हैं, जो साफ संकेत देते हैं कि ठगी एक-दो दिन का खेल नहीं, बल्कि सोची-समझी और संगठित साजिश थी।
डिजिटल इंडिया में डिजिटल लूट
यह मामला सिर्फ एक पेट्रोल पम्प या एक ठग का नहीं है, बल्कि उस ढीले सिस्टम का आईना है जहां डिजिटल भुगतान तो बढ़ गया, लेकिन निगरानी, जवाबदेही और सुरक्षा अब भी फाइलों में बंद है।
जब तक ऐसे मामलों में सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क और अंदरूनी मिलीभगत पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक स्कैनर, क्यूआर कोड और डिजिटल सिस्टम सुविधा कम, खतरा ज़्यादा बने रहेंगे।




