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उत्तराखण्ड

अवैध खनन पर पुलिस का “एक्शन”: नीचे वाले लाइन हाजिर, ऊपर वाले बेदाग!

उत्तराखंड में अवैध खनन कोई नई कहानी नहीं है। यह ऐसा संगठित अपराध बन चुका है जिसकी गूंज नदियों से लेकर सत्ता के गलियारों तक सुनाई देती है। लेकिन जब भी इस अवैध कारोबार पर सवाल उठते हैं, तो अक्सर वही पुराना फार्मूला सामने आता है—कुछ सिपाही और दरोगा सस्पेंड, कुछ को लाइन हाजिर… और मामला ठंडा।

एक बार फिर ऐसा ही दृश्य ऊधमसिंहनगर में देखने को मिला है।
मीडिया में आई खबरों का संज्ञान लेते हुए ऊधमसिंहनगर के SSP अजय गणपति ने अवैध खनन पर लापरवाही के आरोप में चौकी शक्तिफार्म के प्रभारी समेत पूरी चौकी को लाइन हाजिर कर दिया है।
प्रेस को जारी विज्ञप्ति के अनुसार, अवैध खनन पर प्रभावी अंकुश न लगा पाने और ड्यूटी के प्रति उदासीनता तथा लापरवाही पाए जाने पर चौकी प्रभारी शक्तिफार्म उप निरीक्षक प्रकाश चन्द्र भट्ट सहित कुल 8 पुलिस कर्मियों को तत्काल प्रभाव से लाइन हाजिर किया गया है।
कागजों में देखें तो यह कार्रवाई काफी सख्त लगती है। लेकिन असली सवाल वहीं खड़ा है—क्या सच में अवैध खनन का खेल सिर्फ सिपाहियों और दरोगाओं के दम पर चलता है?

खनन का खेल और जिम्मेदारी का गणित

उत्तराखंड के कई जिलों में अवैध खनन का कारोबार खुलेआम चलता है। रात के अंधेरे में नदियों से निकलते ट्रैक्टर-ट्रॉली और डंपर किसी से छिपे नहीं होते। स्थानीय लोग, पत्रकार और सामाजिक संगठन बार-बार सवाल उठाते रहे हैं कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में खनन कैसे हो जाता है, अगर प्रशासन को इसकी भनक ही न लगे?
लेकिन जब कार्रवाई होती है तो निशाने पर अक्सर वही निचले स्तर के कर्मचारी आते हैं—सिपाही और दरोगा।
इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है। शक्तिफार्म चौकी के प्रभारी समेत पूरे स्टाफ को लाइन हाजिर कर दिया गया। संदेश साफ है—अवैध खनन रोकने में लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी।
पर सवाल यह है कि क्या इससे अवैध खनन रुक जाएगा?

क्या सिर्फ लाइन हाजिर से खत्म होगा अवैध खनन?

प्रदेश में अवैध खनन की जड़ें इतनी गहरी हैं कि यह केवल पुलिस की लापरवाही का मामला नहीं रह गया है। यह एक संगठित नेटवर्क की तरह काम करता है, जिसमें ट्रांसपोर्ट, ठेकेदार, स्थानीय प्रभावशाली लोग और कई स्तरों पर प्रशासनिक चुप्पी भी शामिल होने के आरोप लगते रहे हैं।
ऐसे में केवल कुछ पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर करना अक्सर एक “प्रशासनिक रस्म” जैसा लगता है—जिससे यह संदेश दिया जा सके कि कार्रवाई हो रही है।
लेकिन जमीन पर हालात बहुत कम बदलते हैं।

नीचे वाले दोषी, ऊपर वाले हमेशा पाक-साफ?

खनन के मामलों में एक दिलचस्प पैटर्न अक्सर दिखाई देता है। जब भी मामला सामने आता है, तो कार्रवाई की तलवार सबसे पहले निचले स्तर के पुलिसकर्मियों पर गिरती है।
यह मान लिया जाता है कि अवैध खनन में मिलीभगत या अवैध वसूली का खेल सिर्फ सिपाही और दरोगा तक ही सीमित होता है, जबकि उनसे ऊपर बैठे अधिकारी इस पूरे सिस्टम से बिल्कुल अनजान रहते हैं।
यही वजह है कि जनता के बीच यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या सच में इतने बड़े पैमाने पर होने वाला अवैध खनन सिर्फ चौकी स्तर की लापरवाही से संभव है?

मीडिया की खबरों के बाद जागा प्रशासन
इस पूरे मामले में एक और अहम पहलू यह है कि कार्रवाई तब हुई जब मीडिया में खबरें सामने आईं।

SSP ने मीडिया रिपोर्ट्स का संज्ञान लेते हुए यह कदम

उठाया। इससे यह भी साफ होता है कि पत्रकारिता और जनदबाव आज भी प्रशासन को कार्रवाई के लिए मजबूर करने की ताकत रखते हैं।
लेकिन सवाल फिर वही है—क्या यह कार्रवाई सिर्फ दिखावे तक सीमित रह जाएगी या वाकई अवैध खनन के पूरे नेटवर्क की जांच होगी?

खनन माफिया का मजबूत नेटवर्क

उत्तराखंड की कई नदियां आज अवैध खनन की वजह से बुरी तरह प्रभावित हो चुकी हैं। पर्यावरणविद लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि यदि यही स्थिति रही तो नदियों का प्राकृतिक स्वरूप बदल जाएगा, भूजल स्तर पर असर पड़ेगा और बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है।
इसके बावजूद खनन माफिया का नेटवर्क इतना मजबूत है कि कई बार कार्रवाई के बावजूद यह कारोबार रुकता नहीं, बल्कि कुछ समय बाद फिर उसी रफ्तार से शुरू हो जाता है।

जनता पूछ रही है—कब टूटेगा यह खेल?

शक्तिफार्म चौकी के पूरे स्टाफ को लाइन हाजिर करने की कार्रवाई निश्चित रूप से एक सख्त संदेश देने की कोशिश है।
लेकिन जनता अब सिर्फ “लाइन हाजिर” से आगे की कार्रवाई देखना चाहती है।
लोग पूछ रहे हैं कि अगर अवैध खनन इतना बड़ा अपराध है तो क्या इसकी जांच केवल चौकी स्तर तक ही सीमित रहेगी?
क्या इस पूरे नेटवर्क की गहराई तक जांच होगी?
और क्या कभी ऐसा दिन आएगा जब खनन माफिया के साथ-साथ उनके संरक्षण देने वाले चेहरे भी बेनकाब होंगे?
फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड में अवैध खनन का मुद्दा सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि कानून और व्यवस्था की साख का भी सवाल बन चुका है।
और जब तक इस पूरे खेल की जड़ तक पहुंचने की कोशिश नहीं होगी, तब तक कुछ दरोगाओं और सिपाहियों को लाइन हाजिर करने की खबरें आती रहेंगी… और नदियों से खनन भी चलता

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