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उत्तराखण्ड

रामनगर: तीन केस झेल चुका तस्कर फिर चरस-स्मैक के साथ दबोचा गया

रामनगर: तीन केस झेल चुका तस्कर फिर चरस-स्मैक के साथ दबोचा गया

रामनगर। देवभूमि के शांत शहर रामनगर में नशे का जाल किस कदर गहरा चुका है, इसका ताजा उदाहरण नई बस्ती गुलरघट्टी से सामने आया है। 64.47 ग्राम चरस और 25.43 ग्राम स्मैक के साथ एक कुख्यात तस्कर की गिरफ्तारी ने यह साफ कर दिया है कि नशे का कारोबार यहां अब छोटे-मोटे धंधेबाजों का नहीं, बल्कि संगठित नेटवर्क का रूप ले चुका है।
गिरफ्तार अभियुक्त की पहचान दीपक कश्यप उर्फ काली (33) निवासी नई बस्ती गुलरघट्टी के रूप में हुई है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह कोई पहली बार कानून के हत्थे चढ़ा नाम नहीं है। इसके खिलाफ पहले से ही NDPS एक्ट के तीन मुकदमे दर्ज हैं—2020, 2021 और 2023 में भी यह नशे के कारोबार में पकड़ा जा चुका है। सवाल सीधा है: जब तीन बार केस दर्ज हो चुके थे, तो यह चौथी बार खुलेआम नशा बेचने तक कैसे पहुंच गया?
यही वह कड़वी सच्चाई है जो रामनगर में नशे के बढ़ते जाल की पोल खोलती है। बार-बार गिरफ्तारी के बावजूद तस्कर का बेखौफ होकर फिर उसी धंधे में उतर जाना इस बात का संकेत है कि या तो कानून का डर खत्म हो चुका है या फिर नशे के इस कारोबार के पीछे कोई बड़ा संरक्षण तंत्र सक्रिय है।
नई बस्ती गुलरघट्टी जैसे घनी आबादी वाले इलाके में चरस और स्मैक की इतनी मात्रा मिलना यह बताता है कि यहां सिर्फ सप्लाई नहीं, बल्कि लोकल डिस्ट्रीब्यूशन का पूरा नेटवर्क चल रहा है। यानी यह सिर्फ एक तस्कर नहीं, बल्कि एक पूरी चेन की कड़ी है, जो युवाओं को धीरे-धीरे नशे की खाई में धकेल रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इलाके में लंबे समय से नशे की गतिविधियां चल रही थीं, लेकिन ठोस रोकथाम नहीं हो सकी। अब जब चौथी बार वही नाम सामने आया है, तो यह सवाल और भी गंभीर हो गया है कि आखिर ऐसे आदतन तस्करों पर सख्त कानूनी शिकंजा क्यों नहीं कस पाया?
NDPS एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर औपचारिक कार्रवाई जरूर कर दी गई है, लेकिन असली सवाल गिरफ्तारी से बड़ा है—क्या यह कार्रवाई नशे के पूरे नेटवर्क तक पहुंचेगी या फिर हर बार की तरह केवल एक छोटे चेहरे को पकड़कर फाइल बंद कर दी जाएगी?
रामनगर में बढ़ता नशा अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक आपदा बनता जा रहा है। स्कूल-कॉलेज के युवाओं तक पहुंचती स्मैक और चरस आने वाले समय की भयावह तस्वीर दिखा रही है। अगर इसी तरह पुराने तस्कर बार-बार पकड़े जाते और फिर उसी धंधे में लौटते रहे, तो नशामुक्ति के दावे सिर्फ कागजों में ही सीमित रह जाएंगे, जमीन पर नहीं.

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