उत्तराखण्ड
सावित्रीबाई फुले जयंती पर दोहरी शिक्षा व्यवस्था और महिला सुरक्षा पर तीखा प्रहार
महिला एकता मंच की संगोष्ठी में सरकार, पितृसत्ता और वीआईपी संस्कृति पर खुला सवाल
रामनगर। देश की प्रथम महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले की 195वीं जयंती के अवसर पर महिला एकता मंच ने चन्द्रनगर मालधन स्थित पंचायत भवन में संगोष्ठी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कर शिक्षा और महिला सुरक्षा के सवाल पर सत्ता और व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया। वक्ताओं ने दोहरी शिक्षा प्रणाली, बढ़ते महिला अपराध और अंकिता भंडारी हत्याकांड की सीबीआई जांच से सरकार के इंकार को सीधे तौर पर जनविरोधी करार दिया।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए सरस्वती जोशी ने कहा कि सावित्रीबाई फुले ने पुरातनपंथ, जातिवाद और कट्टर सोच से टकराकर नारी शिक्षा की मशाल जलाई, लेकिन आज भी देश में समान शिक्षा का सपना अधूरा है। उन्होंने कहा कि अमीरों के लिए अलग और गरीबों के लिए अलग शिक्षा व्यवस्था समाज में बराबरी के दावे की पोल खोलती है। जब तक सभी वर्गों को निशुल्क, गुणवत्तापूर्ण, वैज्ञानिक, तर्कपरक और मातृभाषा में समान शिक्षा नहीं मिलेगी, तब तक सामाजिक न्याय केवल नारा बना रहेगा।
महिला एकता मंच की संयोजक ललिता रावत ने कहा कि सावित्रीबाई फुले ने कीचड़ और पत्थर झेलकर भी लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला और पितृसत्तात्मक समाज को चुनौती दी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि आज भी पुरुषप्रधान व्यवस्था महिलाओं को बराबरी से रोकना चाहती है। ऐसे में महिलाओं को स्वयं सावित्रीबाई बनकर आगे आना होगा, तभी समाज बदलेगा।
विनिता टम्टा ने महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर चिंता जताते हुए कहा कि आज महिलाएं न घर में सुरक्षित हैं, न बाहर—यह व्यवस्था की असफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
कार्यक्रम में कौशल्या ने अंकिता भंडारी हत्याकांड का मुद्दा उठाते हुए भाजपा सरकार पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि हत्या से पहले अंकिता ने वीआईपी दबाव की बात अपनी चैट में कही थी। अब जब उर्मिला द्वारा जारी कॉल रिकॉर्डिंग में भाजपा नेताओं के नाम सामने आ चुके हैं, तो सरकार सीबीआई जांच से क्यों भाग रही है? यदि नेता निर्दोष हैं तो जांच से डर कैसा?
गोष्ठी में गिरीश चंद्र, अध्यापक प्रेम सागर, इंद्रजीत ममता सहित अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम ने स्पष्ट संदेश दिया कि सावित्रीबाई फुले को याद करना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि शिक्षा, समानता और न्याय के लिए सत्ता से सवाल पूछने का साहस है।




