उत्तराखण्ड
गोली से सत्ता का घमंड, लहूलुहान इंसानियत
पार्षद अमित बिष्ट की बंदूक से बुझा एक घर का चिराग, 19 साल का बेटा भी अपराध में शामिल
हल्द्वानी से आई यह वारदात सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि सत्ता के नशे में डूबे उस चेहरे की असल तस्वीर है जो खुद को “जनप्रतिनिधि” कहलवाता था। मानपुर उत्तर वार्ड में गोली चलने के साथ ही एक परिवार की दुनिया उजड़ गई—और यह गोली किसी अपराधी गिरोह ने नहीं, बल्कि नगर की राजनीति में सक्रिय पार्षद अमित बिष्ट ने चलाई।
रात के अंधेरे में चली यह गोली सीधे एक घर के इकलौते चिराग को निगल गई। सवाल यह नहीं कि हत्या हुई, सवाल यह है कि हथियार किसके हाथ में था और हिम्मत कहां से आई। जवाब साफ है—सत्ता का घमंड, लाइसेंसी बंदूक और कानून को जेब में रखने का भ्रम।
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, इस मामले में अमित बिष्ट के साथ उसका 19 वर्षीय बेटा जय बिष्ट भी सह-आरोपी बनकर सामने आया है। यानी अपराध सिर्फ पिता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कानून तोड़ने की ‘विरासत’ बेटे तक पहुंचा दी गई। जिस उम्र में युवा कॉलेज, करियर और भविष्य की बात करते हैं, उसी उम्र में जय बिष्ट के हाथ से पिस्टल और जिंदा कारतूस बरामद होना पूरे समाज के लिए एक डरावना संकेत है।
यह भी कम चौंकाने वाला नहीं कि हत्या लाइसेंसी दो नाली बंदूक से की गई—वही हथियार जो सुरक्षा के नाम पर दिया जाता है, न कि किसी की जिंदगी छीनने के लिए। निजी रंजिश का हवाला देकर इस वारदात को “आपसी विवाद” बताना, असल मुद्दे से भागने की कोशिश है। असल सवाल यह है कि
क्या जनप्रतिनिधि कानून से ऊपर हैं?
क्या हथियार का लाइसेंस मौत का लाइसेंस बन चुका है?
आज एक परिवार अपने बेटे की अर्थी उठा रहा है, और दूसरी तरफ एक पार्षद अपने रसूख के हिसाब-किताब में उलझा है। यह मामला सिर्फ अदालत का नहीं, बल्कि समाज के विवेक का भी इम्तिहान है। अगर ऐसे जनप्रतिनिधियों पर सख्त और उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो कल हर गली में “सत्ता की गोली” चलती दिखेगी।
एटम बम पूछता है:
जब जनता का प्रतिनिधि ही जनता का कातिल बन जाए, तो फिर लोकतंत्र की रक्षा कौन करेगा?




