उत्तराखण्ड
खनन माफिया के आगे नतमस्तक सिस्टम! अवैध खनन रोकने गए अधिकारी पर ही मुकदमा, अब हाईकोर्ट ने कहा पूरी कोतवाली का तबादला करो
खनन माफिया के आगे नतमस्तक सिस्टम! अवैध खनन रोकने गए अधिकारी पर ही मुकदमा, अब हाईकोर्ट ने कहा पूरी कोतवाली का तबादला करो
नैनीताल/देहरादून।
उत्तराखंड में अवैध खनन सिर्फ नदी-नालों को ही नहीं खोखला कर रहा, बल्कि कानून-व्यवस्था की रीढ़ भी चबा रहा है। और सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस खनन माफिया की इतनी हिम्मत आती कहां से है? जवाब अक्सर एक ही दिशा में इशारा करता है—सिस्टम के भीतर बैठे कुछ ऐसे हाथ, जो कानून की वर्दी पहनकर भी माफियाओं के साथ खड़े नजर आते हैं।
ताजा मामला देहरादून जिले के विकासनगर का है, जहां अवैध खनन रोकने गए वन विभाग के एसडीओ राजीव नयन नौटियाल पर ही खनन माफियाओं ने हमला कर दिया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। हमला झेलने वाले अधिकारी को न्याय दिलाने के बजाय ऐसा खेल खेला गया कि पूरा सिस्टम कटघरे में खड़ा हो गया।
हद तो तब हो गई जब खनन कारोबारी मनीष चौहान की शिकायत पर उसी अधिकारी के खिलाफ रात 12 बजकर 15 मिनट पर मुकदमा दर्ज कर दिया गया। यानी जो अधिकारी अवैध खनन रोकने गया था, उसी को कानून के शिकंजे में कसने की तैयारी शुरू कर दी गई। सवाल उठता है कि क्या यह सब महज संयोग है या फिर माफिया और वर्दी के बीच कोई गहरी समझदारी काम कर रही थी?
मामला जब नैनीताल हाईकोर्ट पहुंचा तो अदालत ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी नाराजगी जताई। जस्टिस राकेश थपलियाल की सिंगल बेंच ने सुनवाई के दौरान साफ शब्दों में पूछा—
“आखिर यहां हो क्या रहा है? आप अपने ही अधिकारी की सुरक्षा नहीं कर पा रहे हैं?”
कोर्ट ने मामले की गंभीरता देखते हुए विकासनगर कोतवाली के पूरे स्टाफ के तबादले का आदेश दे दिया। इतना ही नहीं, जिस अधिकारी ने यह मुकदमा दर्ज किया था, उसे सस्पेंड करने के निर्देश भी दिए गए हैं। अदालत ने पुलिस महानिदेशक और एसएसपी देहरादून को आदेश का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने को कहा है, जबकि संबंधित एसएचओ से भी स्पष्टीकरण मांगा गया है।
यह घटना सिर्फ एक अधिकारी के साथ हुए अन्याय की कहानी नहीं है, बल्कि उस सच्चाई का आईना है जिसमें अवैध खनन का कारोबार एक संगठित अपराध की तरह फल-फूल रहा है। नदियों से निकलने वाली रेत-बजरी का यह धंधा करोड़ों का है और आरोप बार-बार यही लगते हैं कि इस धंधे में माफिया अकेले नहीं, बल्कि कुछ “सरकारी साझेदार” भी शामिल रहते हैं।
उत्तराखंड में पहले भी कई बार अवैध खनन को लेकर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन हर बार कार्रवाई की जगह फाइलों की धूल ही ज्यादा उड़ती नजर आती है। इस बार फर्क इतना है कि अदालत ने सीधे हस्तक्षेप कर दिया और पुलिस की भूमिका पर ही सवाल खड़ा कर दिया।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई सचमुच अवैध खनन के नेटवर्क को तोड़ पाएगी या फिर कुछ दिनों बाद सब कुछ फिर से उसी पुराने ढर्रे पर लौट आएगा—जहां नदियां लुटती रहेंगी, माफिया फलते-फूलते रहेंगे और ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारी ही सिस्टम में सबसे ज्यादा असुरक्षित बने रहेंगे।




