उत्तराखण्ड
फूलों से रंग रही होली: कनियां के महिला समूह ने तैयार किए प्राकृतिक रंग
रामनगर। होली के त्योहार से पहले इस बार एक सुखद और प्रेरणादायक पहल सामने आई है। महिला संसाधन एवं विकास केंद्र, कनियां से जुड़ी महिलाएँ पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति की ताकत के सहारे फूलों से प्राकृतिक रंग तैयार कर रही हैं। इन रंगों की खासियत यह है कि ये पूरी तरह सुरक्षित, त्वचा के अनुकूल और पर्यावरण हितैषी हैं।
बाजार में मिलने वाले रासायनिक रंग जहाँ त्वचा रोग, एलर्जी और आँखों में जलन जैसी समस्याएँ पैदा करते हैं, वहीं इन महिलाओं द्वारा तैयार किए गए रंग स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह नहीं हैं। समूह की महिलाओं ने गेंदे, गुलाब और पलाश जैसे फूलों को सुखाकर और प्राकृतिक विधि से प्रोसेस कर रंग तैयार किए हैं।
महिलाओं का कहना है कि उनका उद्देश्य सिर्फ रंग बनाना नहीं, बल्कि लोगों को जागरूक करना भी है कि होली खुशियों का त्योहार है, बीमारियों का नहीं। प्राकृतिक रंगों के उपयोग से बच्चों, बुजुर्गों और संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को किसी तरह की परेशानी नहीं होगी। साथ ही, ये रंग पानी और मिट्टी को भी प्रदूषित नहीं करते।
यह पहल महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने की दिशा में भी एक मजबूत कदम है। स्थानीय स्तर पर तैयार इन रंगों की बिक्री से महिलाओं को आय का स्रोत मिल रहा है और ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिल रहा है। त्योहार के मौके पर स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने से “वोकल फॉर लोकल” की भावना भी मजबूत हो रही है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि अगर इस तरह की पहल को प्रोत्साहन मिले, तो भविष्य में रासायनिक रंगों पर निर्भरता कम हो सकती है और लोग सुरक्षित तथा पर्यावरण अनुकूल होली मना सकेंगे।
इस होली, रंगों के साथ एक संदेश भी फैल रहा है — प्रकृति से जुड़ो, सुरक्षित रहो और स्थानीय महिलाओं का समर्थन करो।




