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बेंगलुरु में इंस्पेक्टर 4 लाख की ‘सेवा शुल्क’ लेते रंगे हाथों पकड़ा गया

कानून का रखवाला या रिश्वत का ठेकेदार

बेंगलुरु से एक बार फिर वही पुरानी कहानी बाहर आई है, बस किरदार बदलते रहते हैं। इस बार वर्दी पहने एक इंस्पेक्टर साहब कानून नहीं, “रेट लिस्ट” संभालते पकड़े गए।
केपी अग्रहर पुलिस थाने में तैनात इंस्पेक्टर गोविंदराजू को लोकायुक्त पुलिस ने 4 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। जैसे ही लोकायुक्त की टीम ने जाल बिछाकर दबोचा, साहब की बहादुरी वर्दी के साथ ही उतर गई। मौके पर ही घबराहट में चीखना-चिल्लाना शुरू… मानो रिश्वत नहीं, कोई गलतफहमी हो गई हो!

शिकायतकर्ता से “मदद” के नाम पर वसूली
मामला जुड़ा है बिल्डर मोहम्मद अरकम की शिकायत से, जो कथित तौर पर चिट फंड फ्रॉड से जुड़ा था।
आरोप है कि शिकायत में “मदद” करने के बदले इंस्पेक्टर साहब ने 4 लाख रुपये की डील फाइनल की थी। यानी न्याय भी अब “पैकेज” में मिलने लगा है — शिकायत करो, और ऊपर से सेवा शुल्क भी भरो!

लोकायुक्त का जाल, रिश्वतखोर बेहाल
लोकायुक्त पुलिस ने पूरी तैयारी के साथ ट्रैप बिछाया और जैसे ही रकम हाथ में आई, इंस्पेक्टर गोविंदराजू भी कानून के उसी जाल में फँस गए, जिसे आम जनता के लिए बुना जाता है। फर्क बस इतना है कि आम आदमी फँसता है मजबूरी में, और ये साहब फँसे “मौके” में।

सवाल जो वर्दी से बड़े हैं
क्या अब पुलिस थाने न्याय के मंदिर नहीं, “डीलिंग सेंटर” बनते जा रहे हैं?
आम आदमी शिकायत लेकर जाए तो उसे कानून मिलेगा या रेट कार्ड?
कितने ऐसे गोविंदराजू हैं जो अभी भी “सेटिंग” की कुर्सी पर बैठे हैं?
⚖️ सिस्टम की बीमारी
यह गिरफ्तारी सिर्फ एक इंस्पेक्टर की नहीं, बल्कि उस सोच की है जहाँ कानून का रक्षक ही सौदेबाज़ बन जाता है।
लोकायुक्त की कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन असली सवाल यही है —
क्या यह भ्रष्टाचार की जड़ पर वार है, या फिर सिर्फ एक शाखा काटी गई है?
इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया —
भ्रष्टाचार अब छुपकर नहीं, खुलेआम आत्मविश्वास के साथ होता है… जब तक कोई कैमरा या लोकायुक्त दरवाज़े पर न आ जाए।

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