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“शराब घोटाला” निकला सियासी स्क्रिप्ट! कोर्ट से क्लीन चिट, केजरीवाल-सिसोदिया पर लगे आरोप ध्वस्त
राउज एवेन्यू कोर्ट ने कहा—बिना ठोस सबूत आरोप साबित नहीं; AAP बोली– दिल्ली की सत्ता से हटाने की साजिश का हुआ पर्दाफाश
दिल्ली की राजनीति में लंबे समय से गूंज रहे तथाकथित “शराब घोटाले” पर शुक्रवार को बड़ा न्यायिक फैसला आया, जिसने पूरे मामले की सियासी बुनियाद पर ही सवाल खड़े कर दिए। राउज एवेन्यू कोर्ट ने आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को CBI के शराब नीति केस में सभी आरोपों से बरी कर दिया।
अदालत ने अपने आदेश में साफ शब्दों में कहा कि “बिना ठोस सबूत के आरोप साबित नहीं होते” और अभियोजन पक्ष आरोपों को सिद्ध करने में नाकाम रहा। इस फैसले के साथ ही वो नैरेटिव ढह गया, जिसके सहारे महीनों तक राजनीतिक माहौल को गर्माया गया था।
“साजिश” बनाम “घोटाला” – कोर्ट के फैसले ने बदला खेल
इस मामले को लेकर आम आदमी पार्टी लगातार यह आरोप लगाती रही कि दिल्ली की सत्ता से अरविंद केजरीवाल को हटाने के लिए एक सुनियोजित राजनीतिक साजिश के तहत “शराब घोटाले” का मुद्दा गढ़ा गया। अब अदालत के फैसले ने इस दावे को नया बल दे दिया है।
AAP नेताओं का कहना है कि केजरीवाल और सिसोदिया को महीनों तक जेल में रखकर उनकी छवि धूमिल करने की कोशिश की गई, ताकि दिल्ली की लोकप्रिय सरकार को अस्थिर किया जा सके।
जमानत, गिरफ्तारी और लंबी कानूनी लड़ाई
ज्ञात हो कि अरविंद केजरीवाल को प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 21 मार्च 2024 को गिरफ्तार किया था। बाद में 13 जुलाई 2024 को उन्हें जेल से रिहाई मिली, जब सुप्रीम कोर्ट ने CBI से जुड़े मामले में भी उन्हें जमानत दी थी।
पूरे प्रकरण में ED और CBI—दोनों केंद्रीय एजेंसियों ने जांच की, लेकिन अदालत में आरोपों को साबित करने के लिए ठोस सबूत पेश नहीं कर सकीं।
अदालत का फैसला: आरोपों की नींव ही कमजोर
कोर्ट के फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक शोर-शराबे और मीडिया ट्रायल के बीच कानूनी कसौटी पर मामला टिक नहीं पाया। न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने के लिए विश्वसनीय साक्ष्य पेश करने में विफल रहा, जिसके चलते दोनों नेताओं को बरी करना पड़ा।
AAP में जश्न, विपक्ष पर तीखा हमला
फैसले के बाद आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं में जश्न का माहौल है। पार्टी नेताओं ने इसे “सच की जीत” बताते हुए कहा कि यह फैसला साबित करता है कि दिल्ली की चुनी हुई सरकार को गिराने के लिए झूठे आरोपों की पूरी पटकथा रची गई थी।
AAP का कहना है कि महीनों तक चलाया गया “शराब घोटाले” का नैरेटिव दरअसल एक राजनीतिक हथियार था, जिसका मकसद केजरीवाल को दिल्ली की सत्ता से बेदखल करना था।
बड़ा सवाल: क्या राजनीतिक एजेंडा बन गया था “घोटाला”?
इस फैसले के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस मामले को देश का सबसे बड़ा घोटाला बताकर पेश किया गया, वह अदालत में टिक क्यों नहीं पाया?
क्या यह पूरा मामला सिर्फ राजनीतिक दबाव बनाने और लोकप्रिय नेतृत्व को कमजोर करने की रणनीति था? अदालत के फैसले ने इन सवालों को और तीखा कर दिया है।
फिलहाल, कोर्ट की क्लीन चिट के साथ केजरीवाल और सिसोदिया पर लगे सभी आरोप कानूनी रूप से ध्वस्त हो चुके हैं, लेकिन राजनीति के मैदान में इस फैसले की गूंज अभी लंबे समय तक सुनाई देगी।




