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कोटद्वार में “निष्पक्षता” का खेल भीड़ पर पुलिस बेबस!
कोटद्वार में “निष्पक्षता” का खेल भीड़ पर पुलिस बेबस!
कोटद्वार में हुआ ताज़ा घटनाक्रम कानून के तराजू की “बराबरी” पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। कागज़ों में सब कुछ पारदर्शी दिखता है, लेकिन ज़मीनी तस्वीर कुछ और कहानी कह रही है।
मामला एक वृद्ध मुस्लिम दुकानदार की दुकान से “बाबा” शब्द हटाने को लेकर शुरू हुए विवाद से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि इस मुद्दे पर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं से टकराव हुआ। इस टकराव में दीपक और उसके एक साथी के खिलाफ कमल पाल की शिकायत पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया। आरोप गंभीर हैं — गाली-गलौज, जाति-सूचक शब्दों का प्रयोग और जान से मारने की नीयत से हमला करने तक की धाराएँ लगा दी गईं।
यानि जिन लोगों ने कथित तौर पर मौके पर विरोध किया, वे सीधे कानून के शिकंजे में हैं। कागज़ी कार्रवाई में पुलिस की फुर्ती देखने लायक है।
लेकिन कहानी का दूसरा अध्याय और दिलचस्प है।
इसी घटना की प्रतिक्रिया में 31 जनवरी को करीब 30–40 लोग दीपक कुमार के विरोध में उसके जिम और पटेल मार्ग स्थित “बाबा ड्रेस” की दुकान पर पहुँच गए। नारेबाजी हुई, सड़क जाम की गई, माहौल गरमाया। आरोप है कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले शब्द बोले गए और सार्वजनिक शांति भंग करने की कोशिश हुई। धक्का-मुक्की भी हुई।
यहाँ सवाल उठता है — जब इतना कुछ हुआ, भीड़ सामने थी, प्रदर्शन खुला था, तो पुलिस के पास नाम क्यों नहीं हैं?
पुलिस का कहना है कि ये “अज्ञात” लोग थे। यानी जिन पर गंभीर आरोप लगे, वे पहचान में आ गए। लेकिन जो 30–40 की संख्या में सड़क पर नारे लगा रहे थे, वे पुलिस की नज़र में धुंध बनकर गायब हो गए। न नाम, न चेहरा, न गिरफ्तारी।
कानून की यही “निष्पक्षता” अब चर्चा में है —
एक तरफ नामजद मुकदमा, सख्त धाराएँ, तेज कार्रवाई।
दूसरी तरफ भीड़, हंगामा, सड़क जाम… और सब “अज्ञात”।
स्थानीय लोग पूछ रहे हैं —
क्या कानून व्यक्ति देखकर जागता है और भीड़ देखकर सो जाता है?
क्या FIR की स्याही भी पहचान देखकर गाढ़ी या हल्की होती है?
यह मामला अब सिर्फ एक झड़प का नहीं, बल्कि प्रशासनिक रवैये की विश्वसनीयता का बनता जा रहा है। अगर पुलिस सच में पारदर्शिता और निष्पक्षता की मिसाल पेश करना चाहती है, तो “अज्ञात” चेहरों की पहचान भी उतनी ही ज़रूरी है जितनी नामजद लोगों पर कार्रवाई।
वरना सवाल यही गूंजेगा —
कानून सबके लिए बराबर है, या कुछ के लिए ज्यादा “बराबर”?




