उत्तराखण्ड
रामनगर पर धामी की नजर,सर्वे से ‘सुरक्षित सीट’ की तलाश!
रामनगर फिर क्यों बना धामी के लिए चर्चा का केंद्र? 2022 में गुरु-चेले की लड़ाई ने बदला था पूरा चुनावी गणित
रामनगर। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले अभी सामने न आया हो, लेकिन रामनगर विधानसभा सीट पर सियासी हलचल शुरू हो गई है। इस बार चर्चा सिर्फ संभावित प्रत्याशियों की नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के संभावित चुनावी मैदान को लेकर है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि धामी की टीम रामनगर विधानसभा क्षेत्र के राजनीतिक समीकरणों का आकलन कर रही है। हालांकि मुख्यमंत्री या भाजपा की ओर से अभी तक रामनगर से चुनाव लड़ने को लेकर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है।
लेकिन अगर यह संभावना आगे बढ़ती है तो रामनगर की सियासत में 2022 की कहानी को समझना बेहद जरूरी होगा।
2022 में रामनगर बना था पूरे प्रदेश की सियासत का अखाड़ा
2022 के विधानसभा चुनाव में रामनगर सीट पूरे उत्तराखंड में सुर्खियों में थी। वजह भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर से ज्यादा कांग्रेस के भीतर चल रहा घमासान था।
उस समय रणजीत सिंह रावत रामनगर में लंबे समय से सक्रिय थे। राजनीतिक और सामाजिक कार्यक्रमों के जरिए उन्होंने क्षेत्र में अपना आधार बनाया हुआ था और स्वाभाविक रूप से रामनगर से कांग्रेस टिकट के प्रमुख दावेदारों में उनका नाम माना जा रहा था।
लेकिन चुनाव की घोषणा के साथ ही तस्वीर अचानक बदल गई।कांग्रेस ने रामनगर से हरीश रावत को मैदान में उतारने का फैसला किया।
इसके बाद पार्टी के भीतर विरोध के स्वर उठे। रणजीत सिंह रावत ने हरीश रावत को रामनगर से टिकट दिए जाने का विरोध किया। विवाद इतना बढ़ा कि कांग्रेस ने हरीश रावत का टिकट रामनगर से बदलकर लालकुआं कर दिया, जबकि रणजीत सिंह रावत को सल्ट भेज दिया गया।
रामनगर से अंततः कांग्रेस ने महेंद्र पाल को उम्मीदवार बनाया।
यानी जिस रामनगर सीट पर कांग्रेस को भाजपा के खिलाफ चुनावी लड़ाई लड़नी थी, वहां चुनाव से पहले ही पार्टी के दो बड़े नेताओं के बीच टकराव ने राजनीतिक माहौल बदल दिया।
गुरु-चेले की लड़ाई का नुकसान किसे हुआ?
हरीश रावत और रणजीत सिंह रावत की राजनीतिक नजदीकी को कभी गुरु-चेले के रिश्ते के तौर पर भी देखा जाता रहा था।
लेकिन 2022 में यही रिश्ता रामनगर की चुनावी राजनीति में टकराव की वजह बन गया।
नतीजा यह रहा कि कांग्रेस का चुनावी फोकस भाजपा से मुकाबले के बजाय टिकट और सीट को लेकर पैदा हुए विवाद पर चला गया।
राजनीतिक विश्लेषण में यह बात अक्सर सामने आती रही है कि रामनगर में भाजपा के लिए चुनावी राह हमेशा आसान नहीं रही है और पार्टी को तब ज्यादा फायदा मिलता है जब कांग्रेस के भीतर व्यापक असंतोष या विभाजन की स्थिति बनती है।2022 इसका एक प्रमुख उदाहरण रहा।
अब 2027 में कहानी फिर रामनगर से शुरू होगी?
यही वजह है कि 2027 से पहले रामनगर की राजनीतिक गतिविधियों पर निगाहें टिक गई हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए 2027 की सबसे बड़ी राजनीतिक पहेलियों में से एक यह भी होगी कि वह चुनाव किस सीट से लड़ते हैं।
मुख्यमंत्री रहते हुए 2022 में खटीमा से चुनाव हारने के बाद दोबारा मुख्यमंत्री बनने पर धामी ने चंपावत उपचुनाव में जीत हासिल की थी। अब 2027 में उनके संभावित चुनाव क्षेत्र को लेकर अलग-अलग चर्चाएं हैं।
काशीपुर का नाम भी राजनीतिक चर्चाओं में आता है, लेकिन वहां मौजूदा विधायक त्रिलोचन सिंह चीमा का समीकरण और तराई में सिख समुदाय के राजनीतिक प्रभाव जैसे पहलू भाजपा के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
ऐसे में रामनगर को संभावित विकल्प के तौर पर देखे जाने की चर्चा ने स्थानीय राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है।
धामी आए तो कांग्रेस का चेहरा कौन?
अगर मुख्यमंत्री वास्तव में रामनगर से चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं तो सबसे बड़ा सवाल भाजपा का नहीं, बल्कि कांग्रेस के सामने खड़ा होगा—मुख्यमंत्री के सामने कांग्रेस किसे उतारेगी?
और यहीं फिर रणजीत सिंह रावत का नाम चर्चा में आ जाता है।
यदि कांग्रेस रणजीत सिंह रावत को मैदान में उतारती है तो 2022 के बाद बदली परिस्थितियों में मुकाबला कैसा होगा? क्या 2022 जैसी अंदरूनी खींचतान दोबारा दिखाई देगी या कांग्रेस इस बार एकजुट होकर मुकाबला करेगी?
यह फिलहाल भविष्य के सवाल हैं, लेकिन रामनगर की सियासत में इन सवालों की चर्चा शुरू हो चुकी है।
‘धाकड़-धुरंधर’ मुख्यमंत्री को भी चाहिए सुरक्षित मैदान?
राजनीतिक भाषणों और मीडिया की सुर्खियों में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को अक्सर मजबूत और आक्रामक चुनावी चेहरा बताया जाता है। लेकिन चुनावी राजनीति में बड़े से बड़े नेता के लिए भी ऐसी सीट महत्वपूर्ण होती है, जहां संगठन, स्थानीय समीकरण और चुनावी गणित अपेक्षाकृत अनुकूल हो।
यही वजह है कि मुख्यमंत्री के संभावित चुनाव क्षेत्र को लेकर चल रही चर्चाओं को केवल सीट बदलने की कवायद के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे 2027 की बड़ी चुनावी रणनीति के हिस्से के रूप में भी देखा जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के संभावित चुनाव क्षेत्र को लेकर भी समय-समय पर ऐसी ही चर्चाएं होती रही हैं।
यानी 2027 में मुकाबला सिर्फ पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि यह भी दिलचस्प होगा कि बड़े चेहरे अपने लिए कौन-सा चुनावी मैदान चुनते हैं।
राजनीति संभावनाओं का खेल है…
2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। कौन किस सीट से उतरेगा, कौन किसके सामने होगा और किस सीट पर कौन-सा समीकरण बनेगा—इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में ही साफ होंगे।
फिलहाल मुख्यमंत्री धामी ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं और भाजपा भी खामोश है।
लेकिन अगर रामनगर को लेकर चल रही चर्चाओं में थोड़ी भी सच्चाई निकलती है, तो आने वाले समय में रामनगर विधानसभा सीट उत्तराखंड की सबसे चर्चित चुनावी सीटों में से एक बन सकती है।
और राजनीति में अक्सर असली कहानी वही होती है, जिसकी आधिकारिक घोषणा सबसे आखिर में होती है।फिलहाल रामनगर शांत है… लेकिन सियासी बिसात पर मोहरे चलने शुरू हो चुके हैं।




