राजनीति
जिस थाली में खाया, उसी में छेद! राघव चड्ढा ने AAP छोड़ी, राज्यसभा सीट नहीं — राजनीति का नया ‘संस्कार मॉडल’
जिस थाली में खाया, उसी में छेद! राघव चड्ढा ने AAP छोड़ी, राज्यसभा सीट नहीं — राजनीति का नया ‘संस्कार मॉडल’
दिल्ली की राजनीति में आज फिर वही पुराना खेल देखने को मिला—कुर्सी बचाओ, विचारधारा भुलाओ। आम आदमी पार्टी को कभी “अनपढ़ गुंडों की पार्टी” बताने वाले राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा अब बीजेपी के पाले में जा बैठे हैं। लेकिन दिलचस्प बात ये है कि पार्टी छोड़ दी, मगर जिस राज्यसभा सीट पर बैठकर राजनीति चमकाई, उसे छोड़ने की जरूरत महसूस नहीं हुई।
यानि सिद्धांत बाहर, सुविधा अंदर।
सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राघव चड्ढा ने शुक्रवार को अन्य नेताओं के साथ बीजेपी जॉइन की, जिससे AAP को बड़ा झटका माना जा रहा है।
अब सवाल ये उठ रहा है कि अगर AAP इतनी खराब थी, तो फिर उसकी दी हुई राज्यसभा सीट इतनी प्यारी क्यों लग रही है? जनता पूछ रही है कि पार्टी छोड़ने का साहस तो दिखा दिया, क्या सीट छोड़ने का साहस भी था?
राजनीति में ये नया ट्रेंड चल पड़ा है—जिस पार्टी से पहचान मिली, उसी पर बाद में कीचड़ उछालो। पहले टिकट लो, फिर तंज कसो, फिर विरोधियों के साथ फोटो खिंचवा लो।
राघव चड्ढा का बीजेपी जाना अचानक नहीं माना जा रहा। लंबे समय से उनके तेवर बदलते दिख रहे थे। जब AAP के बड़े नेता जांच एजेंसियों की कार्रवाई में घिरे, तब राघव चड्ढा की चुप्पी सबसे ज्यादा चर्चा में रही। संसद में भी कई मुद्दों पर उनकी खामोशी सवालों में रही। अब वही खामोशी शायद नई राजनीतिक बोली में बदल गई है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जब जांच की आंच करीब पहुंची, तब दूरी AAP से और नजदीकी BJP से बढ़ने लगी। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अलग-अलग राजनीतिक दावों के बीच ही देखी जा रही है।
अब जनता समझ चुकी है—देश में नेता पार्टी नहीं बदलते, सिर्फ पार्किंग बदलते हैं। गाड़ी वही रहती है, नंबर प्लेट नई लग जाती है।
AAP के लिए यह सिर्फ राजनीतिक झटका नहीं, बल्कि भरोसे पर वार माना जा रहा है। और राघव चड्ढा के लिए लोग कह रहे हैं—
“नेता वही सफल, जो सीढ़ी भी इस्तेमाल करे और बाद में उसी को कमजोर भी बताए।”




